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Samadhan
ISBN No : i4b2
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सृष्टि का सिरमौर प्राणी होने के बावजूद मनुष्य जब अनेकानेक समस्याओं से घिर जाता है तब अपने को सबसे गया-गुजरा व हतभाग्य समझते हुए कोसने लगता है। उस समय वह धर्मग्रंथों की यह घोषणा भी भूल जाता है कि जब परमात्मा की अपार कृपा होती है तभी जीव को मनुष्य शरीर की प्राप्ति होती है। मानव तन को शास्त्रों में देव दुर्लभ बताया गया है। इस शरीर में ऐसी-ऐसी अद्भुत क्षमताएं हैं जिन्हें अन्य शरीर में प्राप्त करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह कर्मयोनि है और इसी योनि में जीव को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का सुअवसर भी प्राप्त होता है। माना हमारे जीवन में कभी अनुकूल और कभी प्रतिकूल परिस्थितियां आती जाती रहती हैं किंतु प्रतिकूलताओं के थपेड़े जब बार-बार प्रताड़ित करने लगते हैं तब कई बार हम बड़ी उलझन में पड़ जाते हैं। वैसी स्थिति में बड़े-बडे दिग्गजों के भी हौसले पस्त होने लगते हैं तथा वे अपनी समस्याओं पर विजय पाने के लिए किसी अन्य से मार्गदर्शन पाने के लिए भाग-दौड़ करने लगते हैं ताकि उनकी समस्याओं का समाधान हो सके। मैं सबसे एक ही बात कहता हूं कि अपनी समस्याओं का समाधान आपको स्वयं ही करना है। मेरे पास कोई ऐसी भभूत या तंत्र-मंत्र नहीं है जिससे मैं आप की समस्याओं का समाधान कर दूं। उसके लिए जो कुछ भी करना है, आपको ही करना पड़ेगा। भूख आपको लगी है तो भोजन आपको ही करना होगा। आपके बदले कोई दूसरा व्यक्ति भोजन करके आपकी भूख नहीं मिटा सकता। इसी संदर्भ में मैं आपको एक महत्वपूर्ण बात और याद दिला दूं। जो भी समस्याएं आपको आज परेशान कर रही हैं, वे अचानक आसमान से नहीं टपकी हैं, उनके भी मूल में आपके पूर्वकृत अभुक्त कर्म हैं जिनके फल आपको समस्याओं के रूप में भुगतने पड़ रहे हैं। अत: अपनी समस्याओं के लिए किसी और पर आरोप मत लगाइए। वे आपकी अपनी ही खेतियां हैं जिन्हें आपको आज काटना पड़ रहा है। फिर भी मैं इतना जरूर कहता हूं कि समस्याएं चाहे जितनी भी बड़ी हों, उनसे घबराना नहीं चाहिए क्योंकि संसार में अब तक ऐसी कोई भी समस्या पैदा नहीं हुई जिसका समाधान संभव न हो।
 
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Last updated on 11-12-2017
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