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Daati gurmantra ke upay part - 2(Genral Upay)
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उपाय खंड - 2 परमप्रभु की अहेतुकी कृपा से ही किसी जीव को कर्म योनि मानव शरीर की प्राप्ति होती है। इस संसार के सभी मनुष्य भाग्यशाली हैं, चाहें वे किसी भी देश, धर्म, वर्ण व वर्ग के हों। लेकिन याद रहे, इस दुनिया में जन्म लेना एक बात है और इस जीवन को सही तरीके से जीना दूसरी बात। मैं समझता हूं कि संसार में लोग जन्म लेते हैं और बिना सही तरीके से जीये ही मर जाते हैं। भौतिक दुनिया से झूठे सुखों में उलझे-उलझे ही एक दिन उनकी यह जीवन लीला समाप्त हो जाती है। अत: जन्म पा लेना ही काफी नहीं, जीवन को जीना भी आना चाहिए। सबसे पहले आपके समक्ष मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मेरा उद्देश्य उस धर्म का प्रचार-प्रसार करना है जो सनातन काल से पूर्ववत बिना किसी रद्दोबदल के चलता आ रहा है और लोगों को शाश्वत सुख पाने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करता रहता है। मैं तो आपके सामने बस कुछ तथ्य रखना चाहता हूं जिनके आलोक में अग्रसर होने पर मनुष्य अपने ही अंदर जन्म से ही अवस्थित उस प्रसुप्त महाशक्ति को जगाने में सफल हो जाएं जिससे उसे शाश्वत सुख के असीम भंडार शिव की उपलब्धि हो जाए जिसकी अनुकंपा से अमृत की बारिश में नहाते हुए कृतार्थ हो जीव स्वयं भी शिव स्वरूप बन जाता है। ये तथ्य किसी मजहब या संप्रदाय के दायरे में कैद नहीं हैं। ये तथ्य समग्र मानव जाति से संबंधित है, बिना यह विचार किए कि वह किस धर्म को मानने वाला है, या वह किस देश का रहने वाला है। ये तथ्य सार्वभौमिक व सार्वकालिक सत्य से संबंधित हैं, हर मनुष्य के लिए एक जैसे हैं। ये तथ्य मैं आपके ही समक्ष नहीं पूरी मनुष्य जाति के एक-एक इन्सान के सामने रखना चाहता हूं। जब मैं लोगों के चेहरों पर उभरे भावों को पढ़ता हूं तो स्पष्ट परिलक्षित होता है कि मनुष्य क्या पूरे प्राणिमात्र की चाहत एक ही जैसी है। हर प्राणी सुख की खोज कर रहा है। हर मनुष्य आनंद की खोज कर रहा है। मगर क्या मनुष्य की यह खोज सही दिशा में हो रही है? नहीं । यही वजह है कि मनुष्य द्वारा खोजा गया हर सुख अंतत: दु:ख में ही तब्दील हो जाता है। मनुष्य खोज तो आनंद की करता है, मगर हाथ उसके विषाद ही आता है। वह चलता तो प्रकाश के लिए है, मगर अंधकार में पहुंच जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि संसार के किसी भी कोने में पैदा हुआ मनुष्य, चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय या मजहब से संबंधित हो, उसकी अंतरात्मा सदैव आनंद की ही खोज में लगी रहती है। भौतिक रूप से हम कुछ भी पा लें, हमारा बुनियादी अभाव मिटता नहीं है। अत: मूल सवाल यह है कि हमारा यह अभाव कैसे मिटे? हम अपने मूल स्वभाव को जो आनन्द स्वरूप है, उसे कैसे प्राप्त करें? हमारा मूल स्वभाव अभाव अथवा रिक्ति नहीं है। हम नैसर्गिक रूप से किसी रिक्ति से नहीं बने हैं। हमारा निर्माण आनंद की चरम सीमा और परिपूर्णता की बुनियाद पर हुआ है। मैं मूल रूप से इसी मकसद से संसार में जगह-जगह घूमता हूं और लोगों को सचेत करता हूं कि अपनी शाश्वत-सुखशांति पाने की नैसर्गिक इच्छा की कभी उपेक्षा मत करो। मानव तन सार्थक करने के लिए अपने वास्तविक आनंद स्वरूप को उद्धाटित करने की युक्ति जान लो। यदि इस पुनीत कार्य में मेरी मदद की जरूरत हो तो मुझे बताओ, मुझे आपको मदद करने में प्रसन्नता होगी। सच पूछिए तो यही मेरा मूल उद्देश्य भी है। मैं समय-समय पर अपने व्याख्यानों में अपने इस उद्देश्यका संकेत भी देता रहता हूं। लेकिन बहुत कम लोग इस महत्वपूर्ण पहलू पर गौर करते हैं। वर्तमान युग परिवेश की बहुत प्रकार की प्रतिकूलताएं लोगों को चैन की सांस लेना भी दूभर कर देती हैं। इन बातों को देखते हुए मैं भारतीय ज्योतिष व अन्य ग्रंथों में बताए उपायों का सहारा लेने की प्रेरणा देता रहता हूं ताकि लोग भौतिक बाधाओं से मुक्त हो अपना मानव तन सार्थक करने की साधना के मार्ग में अग्रसर होने के लिए उन्मुख हो सकें। मनुष्य के लिए आधुनिक संसार में वैज्ञानिक प्रगति की बदौलत हर प्रकार की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं। साथ ही वह आध्यात्मिक साधना कर अपने आप को हर प्रकार के बन्धनों से मुक्त कर सकता है। इसी वजह से परमात्मा ने मनुष्य को कर्म करने के अधिकार से सुसज्जित किया है और उसे प्रेरणा देने के लिए अनेकानेक प्राणियों व पदार्थों की भी रचना की है जिनको देख कर मनुष्य बड़ी आसानी से सीख सकता है कि इस जिन्दगी को कैसे और बेहतर ढंग से बिताया जा सकता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता की मनुष्य की चाहत भी कई प्रकार की परिस्थितियों की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। जब प्रतिकूल परिस्थितियां उग्र रूप में खड़ी हो जाती हैं, तब बड़े-बड़े धुरन्धरों के भी छक्के छूट जाते हैं। किन्तु निराशा का ऐसा अंधेरा जब छाने लगे तब हमें उसे अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने देना चाहिए। हमें यह सदैव मानकर चलना चाहिए कि जो भी समस्याएं हमारे सामने खड़ी हो रही हैं, वह अकारण नहीं हैं। उनके पीछे हमारी ही कोई गलती छिपी रहती है। अत: हमसे वैसी गलती फिर दुबारा न हो, उसके लिए भी हमें पूरी तरह चौकन्ना रहना चाहिए। हमारे मनीषियों ने एक बहुत ही अनमोल सूत्र दिया है कि ''परोपकार की भावना से ही कोई कर्म करो और अपने दामन को दूसरों को पीड़ा देने की कालिख से बचाएं रखो।'' यदि हम इस सूत्र को अपनाते हुए कार्य करेंगे तो निश्चित समझिए कि कोई भी विघ्-बाधा हमें पीड़ित नहीं कर पाएगी। दूसरों को हित पहुँचाने में यदि कोई कष्ट भी मिलता है तो वह कष्ट हमें ऐसे आनन्द से परिप्लावित कर देता है कि उसके आगे इन्द्र का वैभव भी शर्मीदा हो जाता है। आंखें पसार कर देखिए, यह समस्त संसार हमें सही मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रेरणा दे रहा है, लेकिन यह तभी सम्भव हो पाएगा, जब हम स्वयं भी यह ठान लें कि सही मार्ग पर ही हमें अग्रसर होना है। यह संसार एक खुली किताब है और इसमें मनुष्य के हित के लिए ही सब कुछ लिखा है। इस चराचर विश्व के समस्त प्राणी व पदार्थ हमारा हौसला बढाने के लिए हमसे कुछ कह रहे हैं। जरूरत है उसे गौर से सुनने की। एक क्षुद्र कीट भी अपना जीवनयापन करते हुए हमें कुछ सिखला रहा है। उनकी सीख हमारे लिए बहुत अनमोल होती है और आपदा के क्षणों में उनसे जो मिलता है, हमारे लिए बहुत अनमोल संबल सिद्ध होता है। याद रहे, प्रतिकूल परिस्थितियों व विघ्-बाधाओं से डर कर जो भाग खड़े होते हैं, वे मनुष्य इस जीवन-संग्राम में कभी जीत नहीं सकते। काफी सोच-विचार और दर-दर भटकने के बाद मैंने यह पाया है कि इस रहस्य भरे कलिकाल में जन्मे अधिकांश मनुष्यों का वर्तमान जीवन मात्र शनिदेव की उपासना से ही मुसीबतों से मुक्त हो सकता है। क्योंकि इस ग्रह स्वरूप में वे सर्वाधिक समय तक प्राणियों को उनके कर्मों का फल प्रदान करते रहते हैं। इतना ही नहीं, लोक-कल्याण की भावना से समय-समय पर शरीर धारण करने वाले महापुरुषों ने भी तत्कालीन परिवेश को ध्यान में रखते हुए सम-सामायिक लोगों को अपना इहलोक व परलोक संवारने का जो-जो उपाय बतलाया है उसमें यह बात स्पष्ट नजर आती है कि मनुष्य का वर्तमान जीवन अति महत्वपूर्ण है और उससे भी महत्वपूर्ण है मनुष्य द्वारा उस समय किये जाने वाले कर्म! जो व्यक्ति किसी ऐसे धर्म-सिद्धान्ंत में विश्वास रखते हैं जिसमें पुनर्जन्म की कोई चर्चा नहीं है, उनके लिए तो वर्तमान जीवन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि यही एकमात्र अवसर है जब जीव को कर्म करने का मौका मिला है और इन्हीं कर्मों का लेखा-जोखा देखकर मनुष्य को मरणोपरांत मिलने वाले स्वर्ग-नरक का फैसला किया जाता है। और प्राचीन शास्त्रों में शनिदेव को कर्म का कारक व कर्मफलदाता घोषित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि शनिदेव पर ही यह मुख्य दायित्व सौंपा गया है कि वे हर मनुष्य को उसके कर्मों के फलों का भुगतान कराकर उसे कर्म बंधन से छुटकारा दिलायें। यही वजह है कि शनिदेव मोक्ष के भी कारक कहे जाते हैं। इसलिए यदि मनुष्य प्रतिकूलताओं व विघ्-बाधाओं से छुटकारा पाना चाहता है तथा अपने मानव तन को सार्थक करने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसे अपने वर्तमान जीवन को खुशहाल बनाने वाले कर्म करने चािहए, उस आभ्यंतरिक साधना की युक्ति जाननी चाहिए। किंतु जबतक वह अनमोल युक्ति हासिल नहीं होती, तबतक अपने कर्मों में सुधार लाते हुए भौतिक रूप से भी अपने को सुखी व संतुष्ट बना लेना चाहिए। युग प्र्रभाव से इस युग में अशुभ कर्मों का फल भोगने के लिए जन्म लेने वाले प्राणियों की संख्या अधिक हो गयी है। क्योंकि कर्मफल भोगने के लिए हर प्राणी बाध्य है। जिन कर्मों का फल भोगने के लिए जन्म मिलता है, उसे प्रारब्ध कहा जाता है। प्रारब्ध कुछ और नहीं, मनुष्य द्वारा किये अपने ही संचित कर्मों का एक अंश होता है जिसे उसे वर्तमान जीवन में ही भोगना होता है। शनिदेव एक मुख्य न्यायाधीश के रूप में जो फैसला देते हैं, उसी के अनुसार प्राणियों को अपने वर्तमान जीवन के विविध आयु स्तरों पर निज पूर्वकृत कर्मफलों को भोगना पड़ता है। यदि हमने इस युग में परोपकार वाले कर्मों व शास्त्रोक्त उपायों का अवलंबन ले शनिदेव को प्रसन्न कर लिया तो बड़ी आसानी से हम अपने जीवन में आये दिन प्रताड़ित करने वाली मुसीबतों से छुटकारा पाने में सफल हो सकेंगे। आधुनिक युग में अपनाई गयी कृत्रिम जीवन-शैली मनुष्य को भले ही आभास न होने दे कि निज पूर्वकृत अभुक्त कर्मों के फलस्वरूप मिलने वाली ग्रह-रश्मियाँ उस पर क्या असर डाल रहीं हैं, किन्तु आभास न होने के कारण इस तथ्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि भारतीय दर्शन शास्त्र और अध्यात्म शास्त्र में प्रतिपादित पूर्व अर्जित संस्कार मनुष्य के सुख-दु:ख, प्रगति-अवनति, जीवन-मरण के प्रमुख कारण हैं। ग्रह उनकी पूर्व सूचना देने वाले होते हैं और उसके अनुरूप सावधानी बरत कर मनुष्य बहुत हद तक प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने का प्रयत्न कर सकता है। इन बातों से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य पूर्वकृत कर्मों का फल भोगने के लिए एक विवश व निरीह प्राणी नहीं है। वह वर्तमान समय में उचित कर्म करके अपने पूर्वकृत कर्मों के फलों को भी प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति खान-पान में अनियमितता के कारण कब्ज का मरीज बन जाता है और जब वह किसी प्राकृतिक चिकित्सक से परामर्श लेता है तब वह उसे दस दिनों तक उपवास करने की सलाह देता है। यानी पूर्वकृत अनियमितता का फल उसे दस दिनों के उपवास का दंड भोगने पर पूरा होता है। किन्तु यदि वह मरीज किसी वैद्य की मदद लेकर शास्त्रोक्त उपाय करते हुए कोई विरेचक औषधि ले लेता है तो उसका कब्ज दूसरे ही दिन ठीक हो जाता है, बिना उपवास का कष्ट भोगे। इसी प्रकार यदि हम शास्त्रोक्त कदम उठायें तो पूर्वकृत अशुभ कर्मों के फल को भी टाला या कम किया जा सकता हैं। हम ग्रहों की स्थितियों के अनुसार भविष्य में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों का निराकरण करने के लिए प्रयत्नशील हो जाएं, यानी यदि ग्रहों की गति के कारण उनकी विष एवं अमृत युक्त रश्मियों की पूर्व सूचना का लाभ उठाकर सही समय पर सही कदम उठाया जाये तो मनुष्य अपने वर्तमान व भविष्य को खुशहाल बनाते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए अग्रसर हो सकता है। याद रहे, परमप्रभु के समस्त ग्रह-स्वरूप जीवों के पूर्वकृत कर्मों के फलों का भुगतान तीन प्रकार से कराते हैं। पुण्य कर्मों के फलों का उच्च स्थान में बैठकर, पाप अधिक होने पर नीचे स्थान में बैठकर कराते हैं। जैसे यदि किसी बच्चे का चंद्रमा उच्च का है तो वह निज पूर्वकृत शुभकर्मों के फलस्वरूप काफी धन कमाने वाला होगा या किसी धनवान के घर पैदा होगा। उसका रंग भी सुन्दर व आकर्षक होगा। यदि किसी मनुष्य के पूर्वकृत कर्म पापयुक्त होंगे तो ग्रहों का न्यायाधीश मंडल उसे कटे-फटे व जीर्ण-शीर्ण अंगों से युक्त पैदा करता है। उसके मस्तिष्क में ग्रह मंडल बेचैनी की आग भर देते हैं। वह सारे भोग्य पदार्थों के उपलब्ध रहने पर भी उनके उपभोग से वंचित रह जाता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए मैं अपने संबोधनों के बाद लोगों से ग्रहों को अनुकूलन करने वाले उपायों की चर्चा अवश्य करता हूं। वास्तु व स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों को दूर करने वाले उपाय भी मैं अपने व्याख्यानों के बाद इसीलिए बताया करता हूं कि लोगों को भौतिक तौर पर हर प्रकार के सुख-संसाधन बिना किसी बाधा के प्राप्त होते रहें ताकि लोग अपना मानव तन सार्थक करने के लिए साधना के क्षेत्र में अग्रसर होने की कोशिश कर सकें और सही दिशा में सही कदम उठा सकें। मुझे इस कार्य में भी आपकी मदद करने में प्रसन्न्ता होगी। लोगों के विशेष आग्रह को ध्यान में रखते हुए ही मैंने विविध मंचों से दिये गये अपने व्याख्यानों के प्रमुख अंशों और बताये गये शास्त्रोक्त उपायों व देशी नुसखों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करवा दिया है ताकि अधिकाधिक लोग इसका लाभ उठा पाएं। प्रभु की असीम अनुकंपा से यह पुस्तक आप के हाथों में 'दाती गुरुमंत्र के उपाय' खंड - 2 नाम से प्रस्तुत है। दाती की कृपा से लोगों की बहुत पुरानी मांग पूरी हुई, इसकी मुझे काफी प्रसन्नता है। मैं प्राय: अपने संबोधनों के बाद जीवन में अक्सर आने वाली परेशानियों व प्रतिकूलताओं पर विजय पाने के भी कुछ शास्त्रोक्त उपाय बता दिया करता हूं। उनमें से कुछ उपाय प्रारब्ध जनित ग्रह-बाधाओं को दूर करने वाले होते हैं और कुछ वास्तु व स्वास्थ्य से संबंधित होते हैं। मेरे द्वारा बताए जाने वाले समस्त उपाय शास्त्रोक्त व आज के वर्तमान परिवेश में संपन्न करने लायक होते हैं। वैसे तो हमारे शास्त्रों में हर प्रकार की समस्याओं के समाधान करने वाले अनेकानेक उपाय बताये गये हैं जिनमें दैहिक-दैविक व भौतिक तापों से त्राण पाने के आजमाए हुए आध्यात्मिक अनुष्ठानों व नुसखाें की बहुत अधिक चर्चा है। मैंने अति सरल व आज के परिवेश में अपनाने लायक उपायों को ही इस पुस्तक में संकलित करने का प्रयास किया है। आशा है, पाठकगण इन उपायों से यथेष्&
 
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