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Daati gurmantra ke upay part - 4(Genral Upay)
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उपाय खंड - 4 मैं कोई आसमानी फरिस्ता नहीं और न कोई देवदूत हूं जिसके पास प्रतिकूलताओं का शमन करने वाला कोई जादुई डंडा है। मैं भी आपकी तरह ही इनसान हूं, मुझमें कोई सुर्खाब के पर नहीं लगे हुए हैं। फिर भी पता नहीं क्यों लोग मेरे पीछे भागते रहते हैं और सोचते हैं कि मेरे पास आने और मेरे पैरों को छू लेने से उनका कल्याण हो जाएगा। अब तो कुछ लोग मुझे उपाय गुरु भी कहने लगे हैं। वे समझते हैं कि मेरे पास सब प्रकार की समस्याओं को हल करने वाले उपाय हैं, हर प्रकार की प्रतिकूलताओं व विध्-बाधाओं के शमन के उपाय हैं। उनकी नजर में मैं एक ऐसा साधु हूं जिसके पास उपायों का खजाना है जिससे हर प्रकार के कष्टों का निवारण हो जाता है और लोगों के जीवन में खुशहाली की बेल लहलहाने लगती है। लेकिन मैं इस प्रकार के भ्रमों को दूर करते हुए सदैव यह भी सपष्ट करता रहता हूं कि आपकी तरह मैं एक सामान्य मनुष्य हूं जो स्वयं खुशहाल रहने के साथ दूसरों को भी खुशहाल रखने में विशेष प्रसन्नता अनुभव करता है। मैं तो एक सामान्य मनुष्य हूं और स्वाभाविक रूप से जन कल्याण की भावना से हर जगह घूमता रहता हूं और जो भी जरूरतमंद प्राणी मुझे मिलते हैं, उनकी सेवा-सहायता करने में मुझे विशेष प्रसन्नता हासिल होती है। जीव का सच्चा कल्याण तो भवचक्र से मुक्त होने में हैं जिसकी प्रेरणा मैं अपने हर प्रवचन में देता रहता हूं। साथ ही मैं अक्सर हर प्रवचन के अंत में लोगों के इह लौकिक जीवन में आने वाली परेशानियों को दूर करने के शास्त्रोक्त उपाय भी बताया करता हूं। लगता है उसी वजह से लोगों ने मुझे उपाय गुरु कहना शुरू कर दिया है। ऐसा नहीं है कि लोगों द्वारा उपाय गुरु कहे जाने से मुझे दुख होता है। इस बात या अन्य किसी बात से दुखी होने वाला मैं कौन हूं। यदि लोगों को वही संबोधन देने में प्रसन्नता हो रही है तो मैं उसी से खुश हूं। जब कभी भी मैं किसी के चेहरे पर खुशहाली भरी मुस्कान देखता हूं, मेरा हृदय बल्लियों उछलने लगता है। हमारा सौभाग्य है कि हमें सुर दुर्लभ मानव शरीर की प्राप्ति हुई है। मानव शरीर पाना एक सुअवसर है जिसमें जीव दुखों से मुक्त होने के लिए कोशिश भी कर सकता है। अन्य प्राणियों को तो प्रारब्धवश पूर्व कर्मों का जो फल उन्हें वर्तमान में मिल रहा है, उसे ज्यों का त्यों भोगना ही पड़ता है। किंतु कर्म करने के अधिकार से युक्त इस मानव योनि में जन्म लेने की वजह से हमें यह आजादी मिली है कि हम अपने प्रारब्ध को ज्यों का त्यों भोगें या प्रतिकूलताओं के शमन का उपाय भी करें, क्रियमाण कर्मों का संपादन कर सांसारिक सुख-समृद्धि की अभिवृद्धि और अपने शरीर को नीरोग रखने के लिए रोगों की चिकित्सा भी कर सकते हैं। इस सर्वश्रेष्ठ शरीर में जन्म-मरण के भवचक्र से मुक्त होने का भी प्रयास कर सकते हैं। लेकिन जब हमारी जिंदगी में निजकृत पूर्वकर्मों के फलस्वरूप प्रारब्धवश प्रतिकूलताओं की आंधी सब कुछ तबाह करने पर तुली रहती है, तब हम मुक्ति-भक्ति आदि के बारे में कुछ सोच भी नही पाते। हालांकि हमारा प्रारब्ध हमारे पूर्वकृत अभुक्त कर्मों से ही बनता है, उसके लिए हम किसी और को दोष नहीं दे सकते, इसलिए उनके लिए हाय तौबा मचाना और दुर्दैव व ग्रह बाधाओं को कोसने से कोई लाभ नहीं होता। उसके लिए तो हमें अपने कर्म करने के अधिकार का उपयोग करते हुए शास्त्रोक्त उपायों का सहारा लेना चाहिए। यही वजह है कि मैं अपने प्रवचनों में दिये जाने वाले आध्यात्मिक संदेश के बाद प्रतिकूलताओं के शमन का उपाय और व्याधियों से छुटकारा पाने के कुछ नुस्खे भी बतलाता रहता हूं। वैसे तो हमारे शास्त्रों में ग्रह-बाधा निवारण व प्रतिकूलता शमन के अनेक उपाय बताए गये हैं लेकिन युग परिवेश को ध्यान में रखते हुए मैं अति सरल उपाय बताया करता हूं जिनसे अधिकाधिक लोग लाभ उठा पाएं। मुझे प्रसन्नता है कि प्रतिकूलताओं के शमन और बाधाओं से बचने के उपायों वाले मेरे प्रवचनों का संग्रह पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया जा रहा है। पाठकों की पसंद से समय की मांग प्रतिबिंबित होती है। इसलिए मैंने सैटर्न पब्लिकेशन प्रा. लि. को अपने उन प्रवचनों को पुस्तकाकार में 'दाती गुरुमंत्र के उपाय भाग - 4' शीर्षक से प्रकाशित करने का निर्देश दिया। इस पुस्तक में विशेष रूप से उन प्रवचनों को संकलित किया गया है जिनमें आत्म कल्याण और मानव-जीवन सार्थक करने की प्रेरणा के साथ इहलौकिक जीवन में सुख-समृद्धि पाने और विघ्-बाधा निवारण के उपायों के साथ वास्तु सलाह और रोग निवारणार्थ देसी नुस्खे भी बताये गये हैं। प्रकाशक ने विशेष रुचि दिखाते हुए पाठकों की मांग को देखते हुए जितनी तेजी से प्रकाशन कार्य पूरा किया उसके लिए वह धन्यवाद का पात्र है। मेरे जिन 31 लघु प्रवचनों को इस पुस्तक में संकलित किया गया है, वे अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक संदेशों से भरे हुए हैं तथा उनमें ज्ञान भक्ति व कर्म की त्रिवेणी बह निकली है। मुझे प्रसन्नता है कि इस पुस्तक में मेरे वैसे ही प्रवचनों को संकलित किया गया है जिनमें दिये गए आध्यात्मिक संदेश बड़े ही मार्मिक और गूढ़ हैं। साथ ही प्रकाशक ने इस बात का भी विशेष ख्याल रखा है कि प्रवचनों के अंत में बताये जाने वाले उपाय अधिकाधिक पाठकों के लिए उपयोगी व कल्याणकारी हों। मैं अपने जीवन में बहुत जगहों पर गया और अनेक महापुरुषों और सिद्ध योगियों के संपर्क में आया। उनके सान्निध्य से जो कुछ भी मुझे प्रसाद रूप में हासिल हुआ, उसे लोगों को लुटाने में मुझे आनंद आता है और उसी मुहिम में मैं अब भी लगा हुआ हूं। इस पुस्तक में मेरा अपना कुछ भी नहीं है जिसको अपनी मौलिक शोध व रचना बताने का मैं दावा करूं। यह तो सनातन काल से पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होने वाले अनमोल मोतियों के समान है जिसे मैंने एक माला के रूप में प्रस्तुत किया है। मैं पाठकों से विनम्र अनुरोध करता हूं कि इसके लिए सभी उन प्राचीन मनीषियों को धन्यवाद दें जिनकी तपस्या व खोजी दृष्टि से पाये गये अनमोल मोतियों की यह माला पुस्तक रूप में उपलब्ध हो गयी है। अंत में मैं पाठकों से यह भी निवेदन करूंगा कि वे इसमें बताये उपायों और नुस्खों का प्रयोग किसी अनुभवी व्यक्ति की देखरेख में ही करें ताकि उनका पूरा लाभ मिल पाये। संभव है, इस पुस्तक के प्रकाशन में कुछ त्रुटियां भी रही गयी हों, अत: प्रबुद्ध पाठक उनकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करें ताकि अगले संस्करण में उन त्रुटियों का परिमार्जन हो सके। आशा है, यह पुस्तक सबके लिए उपयोगी सिद्ध होगी। यदि पाठकों ने इसका जरा भी लाभ उठाया तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा।
 
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Last updated on 23-05-2017
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