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Aarogyakari Kriyain
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मैंने जब से अपना जीवन लोक सेवा के लिए समर्पित किया, मेरा समस्त समय जगह-जगह घूमकर लोगों को अपना मानव तन सार्थक करने के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा देने में ही व्यतीत होता है। प्रभु की अपार कृपा से जीवों को सुर दुर्लभ शरीर की प्राप्ति होती है जिसमें उसे कर्म करने का अपूर्व अधिकार मिला हुआ है। इस सुर दुर्लभ तन का सदुपयोग कर मनुष्य न केवल अपना वर्तमान खुशहाल बना सकता है बल्कि भगवान की भक्ति साधना करके वह बड़ी आसानी से जन्म-मरण के भवचक्र से भी मुक्त हो सकता है। इस कर्म प्रधान विश्व में सभी प्राणी अपने पूर्वकृत कर्मों का फल ही प्रारब्ध रूप में भोग रहे हैं, किंतु मनुष्य के पास कर्म करने का जो अधिकार है, वह किसी अन्य प्राणी को नहीं। यदि मनुष्य शुभ कर्मों में संलग् रहते हुए, अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वाह भी करता रहता है तो उसके पूर्वकृत पापों का भी प्रायश्चित होता रहता है और उसकी भावी जीवन यात्रा भी निरापद ढंग से पूरी हो जाती है। लेकिन याद रहे, जब तक हमारा शरीर स्वस्थ व सशक्त रहता है तभी तक हमसे कोई भी कर्म सही ढंग से संपादित हो पाता है। अस्वस्थ हो जाने पर हम बेचैन हो जाते हैं। उस स्थिति में न तो हमारा शरीर ढंग से कार्य करता है और न हम सही तरीके से चिंतन-मनन या साधना कर पाते हैं। यही वजह है कि मैं लोगों को अपने शरीर को स्वस्थ बनाये रखने की भी प्रेरणा देता रहता हूं। अस्वस्थ हो जाने पर लोग तरह-तरह की औषधियों का सेवन किया करते हैं तथा समाज में रोगों से बचाव के लिए भी अनेकानेक रोग निरोधक औषधियों का प्रयोग धड़ल्ले से जारी है। मैं किसी चिकित्सा पद्धति की आलोचना नहीं करता किंतु जब किसी औषधि के कुप्रभाव से पीड़ित मनुष्य को देखता हूं तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मुझे अपने प्राचीन मनीषियों के स्वानुभूत प्रयोग बड़े ही लाभकारी प्रतीत होते हैं जिससे लोग बिना किसी औषधि के असाध्य रोगों से छुटकारा पा जाते हैं। मनीषियों ने रोगों के आक्रमण से बचने के लिए भी कई प्रकार की शारीरिक क्रियाओं व आसनों के नियमित अभ्यास की सलाह दी है जिनसे लोग एक ऐसे सुरक्षा कवच से युक्त हो जाते हैं जिन्हें भेद कर कोई भी रोग उन्हें पीड़ित नहीं कर पाता। लेकिन अफसोस की बात है कि लोग अपने प्राचीन मनीषियों के इस महान ज्ञान को भूलते जा रहे हैं। बहुत कम लोग उन सरल आरोग्यकारी शारीरिक क्रियाओं की व्यावहारिक जानकारी रखते हैं। इसलिए मैं जगह-जगह प्रशिक्षण शिविर लगाकर लोगों को वैसी आरोग्यकारी शारीरिक क्रियाओं व आसनों की जानकारी देता रहता हूं जिससे लोग भारी संख्या में लाभान्वित होते हैं। काफी दिनों से लोग उन प्रशिक्षण शिविरों में सिखलाई जाने वाली क्रियाओं को पुस्तकाकार में उपलब्ध कराये जाने की मांग कर रहे थे। अत: मैंने सैटर्न पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड को अपने प्रशिक्षण शिविरों के व्याख्यानों व व्यावहारिक विधियों को सचित्र प्रकाशित करने का आदेश दे दिया। प्रसन्नता की बात है कि ट्रस्ट ने मेरे वांछित व्याख्यानों को 'आरोग्यकारी शारीरिक क्रियाएं' नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर लोगों के आग्रह को बड़ी तत्परता से पूरा कर दिखाया है। इस पुस्तक में संकलित सभी आरोगग्यकारी क्रियाओं को चित्रों सहित स्पष्ट करने की भरपूर चेष्टा की गयी है ताकि लोग उन्हें आसानी से समझ कर उनका लाभ उठा सकें। पुस्तक आपके हाथों में है। अत: इसके संबंध में विशेष कुछ कहना उचित नहीं। चूंकि इस पुस्तक के प्रकाशन का कार्य अति उत्साहवश जल्दबाजी में हुआ है। अत: कुछ त्रुटियों का रह जाना स्वाभाविक है। प्रबुद्ध पाठकों व विद्वानों से आग्रह है कि अपने मंतव्य व सुझावों से अवगत कराएं ताकि अगले संस्करण में तदनुसार इस पुस्तक को और अधिक परिष्कृत व परिवर्द्धित किया जा सके। अंत में एक विनम्र निवेदन अवश्य करूंगा कि इस पुस्तक में ऐसा कुछ नहीं है जिसे मैं अपना कहने का दावा कर सकूं। जो कुछ है प्राचीन मनीषियों के स्वानुभूत तथ्यों पर आधारित है। मैनें अपने जीवन में जगह-जगह घूमते हुए योग साधना संबंधी जो गूढ़ ज्ञान अर्जित किया, वह सनातन गुरु परंपरा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाली सनातन विद्या है। अत: उसे अपना कहने की अनधिकार चेष्टा को कोई भी विवेकी व्यक्ति उचित नहीं ठहरा सकता। मैंने अपनी साधना काल में जो कुछ भी सीखा है, उसमें से आज के युग-परिवेश में पले-बढ़े सामान्य लोगों के लिए उपयोगी आरोग्यकारी शारीरिक क्रियाओं की जानकारी सेवा भाव से प्रशिक्षण शिविरों में प्रसाद की तरह वितरित करता रहता हूं। मैनें किसी क्रिया का नया आविष्कार नहीं किया है बल्कि उसी सनातन विद्या के प्रसाद को आज के परिवेश के अनुसार लोगों के समक्ष परोसने का प्रयत्न मात्र किया है। यदि इससे पाठकों ने जरा भी लाभ उठाया तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा।
 
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Last updated on 22-04-2018
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