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Daati gurmantra ke upay part - 5(Genral Upay)
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मित्रो, अपनों से अपनी बात कहकर जो तसल्ली मिलती है, उसकी तुलना संसार के किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। दूसरों से अपनी बात कहने में ज्यादा सावधानी व संजीदगी बरतने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि दूसरे क्या समझ पाएंगे कि मेरी बातों में कितनी सचाई है, केवल बातें ही बातें हैं कि उसके मूल में कुछ तथ्य भी हैं। दूसरों के सामने बड़ी-बड़ी डींगे भी हांकी जा सकती हैं, बहुत कुछ बढ़ा चढ़ा कर भी कहा जा सकता है कि मैं ये हूं, मैं वो हूं। मेरी क्षमता इतनी बड़ी है - उतनी बड़ी है, मैं यह कर सकता हूं वह कर सकता हूं। किंतु अपनों से किसी अतिशयोक्ति में बातें नहीं की जा सकती। हां, अपनों से दूसरों की बातें भी बड़ी आसानी से कही जा सकतीं क्योंकि अपने लोग दूसरों के बारे में उतना कुछ नहीं जानते जितना अपने लोगों के बारे में जानते हैं। लेकिन आज मैं आप सभी मित्रों के सामने एक अति महत्वपूर्ण बात करते हुए एक तथ्य को उजाकर करने जा रहा हूं। इससे न केवल एक तथ्य का खुलासा होता है बल्कि अनेक प्रकार के भ्रमों का निवारण भी होता है। अपनों से अपनी बात दिल खोलकर करनी चाहिए और अपनों में भी जिन लोगों को मित्र का दर्जा दिया जाता है, उनके समक्ष तो अपनी बात रखने में सामाजिक स्तर व शिष्टïाचार के नियमों को भी कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती। मुझे गर्व है कि मैं एक मनुष्य हूं और आज व अभी जीवित हूं तथा कर्म करने की क्षमता से भी युक्त हूं। आश्चर्य है कि मेरे श्वास बिना किसी प्रयत्न के प्रभुकृपा से अनवरत चल रहे हैं। मैं मुनष्य से अधिक कुछ होने में विश्वास नहीं करता। क्योंकि मनुष्य शरीर में ही वह परम पुरुषार्थ किया जा सकता है जिससे जन्म-मरण के दुस्सह्यï दुखों के भयानक सागर से पार पहुंचा जा सकता है। वहां पहुंचकर ही जीव को शाश्वत सुख-शांति उपलब्ध होती है। मनुष्य शरीर में ही प्रार्थना व प्रयत्न करने की क्षमता मिली हुई है, जो क्षमता पाना देवों के लिए भी दुर्लभ है। मेरे बहुत सारे मित्र मुझे परम सिद्घ, तांत्रिक, देवदूत, फरिश्ता व भगवान का अवतार बनाकर महिमामंडित करने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु अपनों से अपनी बात कहने के क्रम में आज मैं स्पष्टï कर देना चाहता हूं कि मुझे फरिश्ता बनकर सातवें आसमान पर बैठने की कोई इच्छा नहीं है। और न ही मैं कोई देवदूत या मसीहा बनकर पूजे जाने का इच्छुक हूं। मैं इस धरती का मनुष्य बने रहने में ही खुश हूं। मनुष्य शरीर में ही जीवों को प्रभु कृपा से भगवान की प्रार्थना व प्रयत्न करने की क्षमता प्राप्त हुई है। इस देव दुर्लभ शरीर को पाकर ही मैं प्रसन्न हूं। इससे अधिक कुछ पाने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। प्रभु की अहेतुकी कृपा से लोक-परलोक संवारने के लिए जो यह सुर दुर्लभ मानव तन प्राप्त हुआ है यह एक अनमोल सुअवसर है, जिसका लाभ उठाते हुए मैं अति प्रसन्न हूं। और चाहता हूं कि सभी मनुष्य इस सुअवसर का यथेष्ठï लाभ उठाएं। लोगों के जीवन में खुशहाली आए और सभी प्रतिकूलताओं का समाधान हो, इसके लिए मैं उनका भरपूर सहयोग करने के लिए तत्पर रहता हूं। प्रत्येक प्राणी की यह सनातन अभिलाषा है कि सदैव सुखी रहूं, जीवन में कभी दु:खों की छाया भी न पड़े। किंतु केवल चाहने मात्र से किसी को सुख की प्राप्ति नहीं हो जाती और न दु:खों से त्राण मिल पाता है। उसके लिए मनुष्य को तदनुरूप कर्म करना पड़ता है। शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य को सुख मिलता है और अशुभ कर्मों के फलस्वरूप दु:ख। लेकिन कर्मों का फल भोगते हुए बार-बार जनमने-मरने का सिलसिला को तो दुरूह भवसागर कहा गया है, जिसमें जीव को भयंकर पीड़ा होती है। उस पीड़ा से मुक्ति सनातन गुरु परंपरा से प्राप्त ज्ञान भक्ति के अभ्यास से ही प्राप्त होती है। यही वजह है कि मैं हमेशा लोगों को इसी बात के लिए प्रेरणा देता रहता हूं कि जरूरतमंदों की सेवा सहायता करते हुए अपने अशुभ कर्मों का प्रच्छालन करते रहो और प्रतिकूलताओं का शमन करने का शास्त्रोक्त उपाय भी जारी रखो। लेकिन लोग हैं कि मनमाने तरीकों और अपनी मान्यताओं पर अड़े रहते हैं। वे मुझे मनुष्य से देवदूत बनाने के लिए, फरिश्ता बनाकर पूजने के लिए व्यग्र रहते हैं। याद रहे, मैं कोई देवदूत नहीं हूं जिसके पास प्रतिकूलताओं का शमन करने वाला कोई जादुई डंडा है। बन्धुओं, मैं भी आप की तरह इंसान हूं। फिर भी पता नहीं क्यों लोग क्यों मेरे पीछे भागते रहते हैं और सोचते हैं कि मेरे पास आने और मेरे पैरों को छू लेने से उनका कल्याण हो जाएगा। अब कुछ लोग मुझे दाती व उपाय गुरु भी कहने लगे हैं। वे समझते हैं कि मेरे पास सब प्रकार की समस्याओं को हल करने वाले उपाय हैं, हर प्रकार की प्रतिकूलताओं व विघ्रबाधाओं के शमन करने वाले उपाय हैं। लोगों की नजर में मैं एक ऐसा विशिष्टï साधु हूं जिसके पास उपायों का खजाना है जिससे हर प्रकार के कष्टïों का निवारण हो जाता है। लेकिन मैं इस प्रकार के भ्रमों को दूर करते हुए बार-बार यह स्पष्टï करता रहता हूं कि मैं भी एक सामान्य मनुष्य हूं और खुद खुशहाल रहने में विश्वास करता हूं और लोगों को खुशहाल बने रहने की प्रेरणा देते हुए प्रसन्नता का अनुभव करता हूं। इसलिए स्वाभाविक रूप से जन कल्याण की भावना से हर जगह घूमता रहता हूं और जो भी जरूरत मंद प्राणी मुझे मिलते हैं उनकी सेवा सहायता करने में मुझे खुशी व आत्मसंतुष्टिï मिलती है। लोग प्रतिकूलताओं के शमन और बाधाओं से बचने के उपायों वाले मेरे प्रवचनों के संग्रह को काफी पसंद कर रहे हैं। पाठकों की मांग को देखते हुए मैंने सैटर्न पब्लिेकेशन्स प्रा. लि. को अपने उन प्रवचनों को पुस्तकाकार में ‘दाती गुरुमंत्र के उपाय भाग-5’ शीर्षक से प्रकाशित करने का निर्देश दिया। इस पुस्तक में विशेष रूप में उन प्रवचनों का संकलन किया गया है जिनमें आत्म कल्याण और मानव जीवन सार्थक करने की प्रेरणा के साथ लौकिक जीवन में सुख-समृद्घि पाने और विघ्रबाधा भगाने वाले उपायों के साथ वास्तु सलाह और रोग निवारणार्थ देसी नुसखे भी बताए गए हैं। प्रकाशक ने विशेष रुचि दिखाते हुए पाठकों की मांग को बहुत जल्दी पूरा किया है। उसके लिए वह धन्यवाद का पात्र है। इस पुस्तक में मेरे ऐसे प्रवचनों का संकलन है जिनमें आध्यात्मिक संदेश बड़े ही मार्मिक और गूढ़ अर्थों से भरे हैं। अपने जीवन में मैं अनेक महापुरुषों और सिद्घ योगियों के संपर्क में आया। उनके सान्निध्य से जो भी प्रसाद मुझे उपलब्ध हुआ, उसे लोगों के बीच लुटाने में आनन्द आने लगा और उसी मुहिम में मैं अब भी लगा हुआ हूं। इस पुस्तक में मेरा अपना कुछ भी नहीं है जिसको अपनी मौलिक शोध व रचना बताने का मैं दावा करूं। यह तो सनातन काल से पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को प्राप्त होती रही और उसे मैंने मोतियों के माला के रूप में आपके समक्ष इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। अंत में मैं पाठकों से पूर्व की भांति यह भी निवेदन करूंगा कि वे इसमें बताये उपायों और नुसखों का प्रयोग किसी अनुभवी व्यक्ति की देखरेख में ही करें ताकि उनका पूरा लाभ मिल पाये। संभव है, इस पुस्तक के प्रकाशन में कुछ त्रुटियां भी रह गयी हों, अत: प्रबुद्घ पाठक उनकी ओर हमारा ध्यान आकृष्टï करें ताकि अगले संस्करण में उन त्रुटियों का परिमार्जन हो सके। आशा है, यह पुस्तक सबके लिए उपयोगी सिद्घ होगी। यदि पाठकों ने इसका जरा भी लाभ उठाया तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा।
 
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Last updated on 12-12-2017
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