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Lali Mere Lal ki, Jit dekhun Tit Lal
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लाली मेरे लाल की 'जित देखूं तित लाल' नामक पुस्तक के रूप में सत्संग सुधा का यह प्रथम प्रवाह अपने प्रिय पाठकों के हाथों में समर्पित करते हुए मुझे काफी प्रसन्नता हो रही है। सत्संग-प्रेमियों का बहुत दिनों से यह आग्रह था कि मेरे सत्संग एक पुस्तक-माला के रूप में लगातार प्रकाशित होने चाहिए ताकि सत्संग में व्यक्त विचारों का बार-बार अनुशीलन कर सत्यान्वेषी साधक लाभ उठा सकें। पिछले कुछ वर्षों से मेरी जीवनचर्या काफी व्यस्त हो गयी है। सत्संग प्रवचन के साथ समाज सेवा के भी कई कार्यों में जुड़ जाने के कारण मेरा अधिकांश समय देशाटन व भ्रमण में ही व्यतीत होता है। हालांकि सत्संग-प्रवचन करना और ज्ञान-ध्यान की बातें व्यावहारिक रूप से जिज्ञासुओं को समझाते रहना भी मेरी जीवनचर्या के अभिन्न अंग बन गये हैं। अत: इनसे मैं कभी अलग नहीं हो पाता। समाज-सेवा को भी मैंने आध्यात्मिक क्षेत्र में विशेष प्रगति देने वाले एक महत्वपूर्ण सोपान के रूप में अपनाया है। उपेक्षित प्राणियों व बेसहारा लोगों की सहायता में हाथ बंटाकर मनुष्य प्रकारांतर से घटघटवासी परमेश्वर की ही सेवा व आराधना करता है - यही संदेश लेकर मैं लोगों के पास जाता हूं और उन्हें इस महान कार्य में योगदान देकर परम प्रभु की विशेष अनुकंपा का पात्र बनने के लिए प्रेरित करता हूं। उस दौरान भी मैं नियमित रूप से लोगों को अध्यात्म मार्ग में अग्रसर होने के लिए सत्संग समारोहों व गोष्ठियों में उपस्थित श्रद्धालुओं को सत्संग सुनाता रहता हूं। किंतु एक स्थान पर ज्यादा समय तक ठहर नहीं पाता। अत: उन स्थानों पर सत्संग प्रेमियों को काफी दिनों तक मेरे पुन: वापस आने की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उनकी उसी असुविधा को दूर करने के लिए अपने सत्संगों की ऑडियो-वीडियो कैसेटें व सीडियां भी मैंने तैयार करवायी हैं। किंतु ज्यादातर लोग उनसे लाभ उठाने की सुविधा से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उनके पास टीवी या वीसीआर आदि आवश्यक मशीनें ही नहीं होतीं। अत: आम लोगों के लिए पुस्तकाकार में सत्संगों का एक शृंखला के रूप में प्रकाशन का सुझाव मुझे भी अच्छा लगा। अत: मैंने सत्संगों को पुस्तकाकार में छापने व वितरण करने का दायित्व 'सैटर्न पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड' को सौंपते हुए, उसे शीघ्रातिशीघ्र लोगों को उपलब्ध कराने की अनुमति प्रदान कर दी। मुझे प्रसन्नता है कि पब्लिकेशन ने बड़ी तत्परता से इस दायित्व को पूरा कर सत्संग प्रेमियों की चिर अभिलाषा को आज पूरा कर दिया है। आशा है, भविष्य में भी यह कार्य उसके द्वारा कुशलता पूर्वक संपादित होता रहेगा। पुस्तक के आकार में छपे मेरे आध्यात्मिक व्याख्यानों व सत्संग प्रवचनों का लाभ श्रद्धालुओं को अधिक मिलता है क्योंकि वे अपनी सुविधा के अनुसार उनका बार-बार अनुशीलन कर सकते हैं। कभी-कभी पुस्तक में पढ़ी हुई बातें सुनी हुई बातों से ज्यादा प्रभावशाली सिद्ध होती हैं। ज्यादातर श्रोता प्रवचन सुनने के दौरान किसी प्रिय या अप्रिय प्रसंग को सुनकर उसी की गुत्थी सुलझाने या विशेषण आदि के चक्कर में देर तक उलझे रह जाते हैं और सत्संग का प्रवाह आगे बढ़ जाता है। जब तक वे श्रोता अपनी मानसिक गुत्थियों को सुलझाने की भूलभुलैया की गिरफ्त से बाहर निकलते हैं तब तक प्रसंग कोई दूसरा चल रहा होता है जिसे पकड़ कर उसके प्रवाह से पुन: तारतम्य बिठा पाना सबके लिए आसान नहीं होता। किंतु जब किसी श्रद्धालु को कोई छपा हुआ सत्संग पढ़ने के लिए मिलता है तो वह संपूर्ण सत्संग का बड़ी आसानी से बार-बार अनुशीलन कर सकता है। इन्हीं बातों पर गौर करते हुए मैंने अपने सत्संगों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करते रहने की अनुमति 'सैटर्न पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड' को दे रखी है। आशा है, इस पुस्तक शृंखला के छपने से श्रद्धालुओं की यह मांग पूरी हो जायेगी। ऐसा नहीं है कि आध्यात्मिक विषय पर इसके पहले मेरी पुस्तकें प्रकाशित नहीं हुई हैं। किंतु वे पुस्तकें किसी खास विषय व स्थान विशेष से संबंधित रही हैं। कुछ आध्यात्मिक पुस्तकें मेरे विविध आध्यात्मिक व्याख्यानों के कुछ प्रसंगों को संकलित करके भी प्रकाशित हुई हैं। किंतु इस पुस्तक-शृंखला में मेरे कुछ वैसे प्रमुख सत्संगों का संकलन है जिनमें मानव शरीर की दुर्लभता, तत्वज्ञान की महत्ता और तत्वज्ञान के दाता सद्गुरु की महिमा पर विशेष प्रकाश डालते हुए जगह-जगह प्राचीन धर्मग्रंथों व मनीषियों के गूढ़ विचारों को भी उद्धृत किया गया है। हमारे देश में किसी विचार व दर्शन को प्राचीन मनीषियों द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आलोक में ही समझने-समझाने की एक सनातन परंपरा रही है। मेरे सत्संगों में भी स्वाभाविक रूप से विरासत में मिली उस प्रवृत्ति की स्पष्ट झलक पाठकों को परिलक्षित होगी। सच पूछिए तो इस पुस्तक में संकलित संत्संगों के अंदर जिन सिद्धांतों व जीवन-दर्शनों की विवेचना की गयी है, उन्हें मौलिक घोषित करने का दावा मैं नहीं करता बल्कि मुझे यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि इसमें प्रस्तुत विचार अति पुरातन हैं, ये सनातन विचार-दर्शन हैं और अविच्छिन्न गुरु-परंपरा से मुझे हासिल हुए हैं तथा उन्हीं को मैंने अपने सत्संगों में व्यक्त किया है। संभव है, सुविज्ञ पाठकों को इसमें पुनरुक्ति दोष भी नजर आये किंतु सत्संग के प्रवाह में जो भी विचार जब भी आये उन्हें स्वाभाविक रूप से प्रकट होने दिया, उन्हें रोकने का मैंने प्रयत्न भी नहीं किया है। जो कुछ हुआ है, स्वांत: सुखाय संपन्न हुआ है। अत: अब इस स्वांत: सुखाय किये गये कार्य से यदि दूसरों का भी भला हो जाता है तो उससे मुझे प्रसन्नता ही होगी। वास्तव में मेरे अंतर्तम में आनंद की अनुभूति तभी होती है जब मैं दूसरे को भी आनंदित देखता हूं। मेरे लिए स्वांत: सुखाय की अवधारणा एक तराजू के रूप में सबके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीज है जिसके अनुसार हर व्यक्ति अपने को अच्छी लगने वाली वस्तु ही दूसरों को देने का प्रयत्न करे, अपने को अच्छा लगने वाला व्यवहार ही दूसरों से करने की कोशिश करे। हमारे प्राचीन मनीषियों ने भी 'आत्मानि प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्' कहते हुए उक्त अवधारणा का ही समर्थन किया है। यह लघु पुस्तिका आपके हाथों में है। अत: इसमें संकलित विचारों की यहां चर्चा करना समय का अपव्यय ही कहा जायेगा। यदि इस पुस्तक-शृंखला से पाठकों के ज्ञान-वर्द्धन में जरा भी सहायता मिली तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा।
 
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Last updated on 11-12-2017
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