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Marm ki Batein Part-II
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हमारे प्राचीन मनीषियों ने 'ऋते ज्ञाना न मुक्ति' का उद्धोष करते हुए ज्ञान की महिमा का गान कर स्पष्ट किया है कि ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती। लेकिन उनका उद्देश्य आभ्यंतरिक ज्ञान की ओर था जिसके आलोक में साधाकों की हृदय-ग्रंथि खुल जाती है और माया-मोह जनित अज्ञान का अंधोरा दूर हो जाता है। सांसारिक वस्तुओं की जानकारियां तो क्षणभंगुर संसार की तरह एक सीमित अवधिा तक ही हमारे काम आती हैं। किंतु वास्तव में हम हैं क्या? इस बात की जानकारी जन्म-जन्मांतर तक हमारे काम आती है और उस ज्ञान से हमारा भूत-भविष्य व वर्तमान तीनों संवर जाता है। वह अलौकिक ज्ञान किसी भी जिज्ञासु व्यक्ति को समय के महापुरुष की अनुकंपा से प्राप्त युक्ति द्वारा उपलब्धा होता है। उसी विशिष्टि जानकारी को हमारे मनीषियों ने ज्ञान, आत्मज्ञान, सत्यज्ञान, ब्रह्मज्ञान आदि कहते हुए विविधा प्रसंगों में उसकी महिमा का बखान किया है। सनातन गुरु परंपरा से वह आध्यात्मिक ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते हुए आज भी सच्चे जिज्ञासुओं को उपलब्धा हो रहा है। उस ज्ञान को पाने की एकमात्रा योग्यता है सच्ची जिज्ञासा। उसे जानने के लिए जिज्ञासु के हृदय में उत्कट प्यास का होना जरूरी है। जो वास्तव में उस ज्ञान के जिज्ञासु होते हैं, उन्हें ही वह मिल पाता है क्योंकि उनको ही उसकी कीमत का वास्तविक अहसास होता है। जिसे प्यास नहीं, उसे चाहे कितना भी शुध्द पानी दिया जाये, वह पानी नहीं पीयेगा। उसके लिए पानी की कोई कीमत ही नहीं, वह उसे फेंक देगा, बर्बाद कर देगा। किंतु जिसे प्यास लगी रहेगी, वह पानी की एक-एक बूंद की कद्र करेगा, उसे बड़ी आतुरता से गटगट पी जायेगा। अज्ञानवश सांसारिक विषयों को पाने के लिए लोग नाना प्रकार के शुभाशुभ कर्म करते रहते हैं, जिनके फल भोग की बेड़ियां उससे निज कर्मों के कड़वे-मीठे फलों का स्वाद चखाने के लिए अनेकानेक योनियों का चक्कर लगवाती रहती हैं। फलस्वरूप जन्म-मरण के चक्र में फंसे जीव की व्याकुलता चरम सीमा पर पहुंच जाती है। किंतु चाहकर भी जीव उससे मुक्त होने का कोई उपाय नहीं कर पाता। जब प्रभु कृपा से जीव को कर्म योनि मानव-तन की प्राप्ति होती है तब वह उस चक्र से निकलने की कोशिश करने लगता है। किंतु सही युक्ति का ज्ञान न होने की वजह से वह जितनी ही कोशिश करता ह,ै वह उसमें और भी उलझता जाता है। उसी उलझन को आसान बनाने के लिए हमारे प्राचीन मनीषियों ने घोषणा की है कि बिना ज्ञान पाये भव चक्र से मुक्ति नहीं मिल सकती। मनीषियों की वह घोषणा जितनी पहले सही थी, उतनी ही आज भी सही है। आज भी ज्ञान पाकर ही किसी को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन ज्ञान पाने के लिए आवश्यक है कि उस मनुष्य में सच्ची जिज्ञासा हो और उसे समय का सही मार्गदर्शक गुरु मिले जो सत्य ज्ञान का आलोक प्रदान कर दे। आज के बदलते युग परिवेश में लोगों के पास समय की बहुत कमी हो गयी है। आधाुनिक सभ्यता की चकाचौंधा में लोग इतने लवलीन हो गये हैं कि उन्हें अपनी भी भलाई का ख्याल नहीं रहता। यही देखकर मैं जगह-जगह घूमकर लोगाें को अपने वास्तविक कल्याण की बात समझाया करता हूं और आवश्यकतानुसार ज्ञान सत्राों का आयोजन कर लोगों में वह सत्य ज्ञान पाने की प्रेरणा का संचार करता रहता हूं। जो सच्चे जिज्ञासु होते हैं उन्हें मैं वह व्यावहारिक युक्ति भी प्रदान करता हूं जिससे अंतर्तम में अवस्थित ज्ञान प्रकट होता है। वह ज्ञान पाकर ही जीव मात्रा का सच्चा हित साधान होता है। ज्ञान सत्राों में उपस्थित श्रध्दालुओं को संबोधिात करते हुए मेरे द्वारा नैसर्गिक रूप से ज्ञान की महिमा से जुड़े विविधा विषयों पर जो उद्गार व्यक्त होते हैं, वे लोगों को बहुत प्रिय लगते हैं। पिछले कई वर्षों से श्रध्दालु भक्तों की यह मांग रही है कि ज्ञान सत्राों के संबोधानों की मार्मिक बातों को संकलित कर पुस्तकाकार में उपलब्धा कराया जाये। न केवल पत्राों द्वारा बल्कि व्यक्तिगत मुलाकातों में भी लोग इसके लिए विशेष आग्रह करते रहते हैं। अत: मैंने सैटर्न पब्लिकेशन को ऐसी सामग्री प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान कर दी क्योंकि लोगों के इस आग्रह के पीछे प्रगाढ़ श्रध्दा, अटूट विश्वास और ज्ञानार्जन की गहरी लालसा थी। प्रभु की कृपा से कुछ ही समय में 1995 से 1998 की अवधिा में विविधा स्थानों पर आयोजित ज्ञान सत्राों के संबोधानों से कई मार्मिक प्रसंगों को संकलित कर 'मर्म की बातें जो राह दिखा दें' नाम से तीन खंडों में प्रकाशित कर दिया। आशा है ये तीनों खंड पाठकों के अदंर आत्म कल्याण की भावना जाग्रत कर उन्हें सत्यज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रेरित करेंगे और ज्ञान अर्जित कर भवचक्र से मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए सचेष्ट करेंगे। यदि पाठकों को इनसे जरा भी लाभ हुआ तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा।
 
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Last updated on 22-04-2018
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