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Saphalta Ke Sanatan Sutra
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यदि हम अपने जीवन में किसी लक्ष्य की सिद्धि करना चाहते हैं तो उसके लिए हमें उचित विधि से कर्म करना होगा। यदि हमारे कर्म में जरा भी चूक होगी तो हम अपने मकसद में कभी कामयाब नहीं हो सकेंगे। लेकिन किसी भी व्यक्ति को अपना लक्ष्य निर्धारित करते समय देश, काल, पात्र व परिस्थिति का ध्यान रखना चाहिये और उसी के अनुरुप अपनी कार्य योजना बनानी चाहिये। किसी भी कार्य योजना में कर्ता, कर्म में प्रयुक्त होने वाले संसाधन और कार्य करने की विधि तथा लक्ष्य जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण कर्म करने वाले व्यक्ति की क्षमता, दृढ़ता व कर्म कुशलता भी होती है। प्रतिकूलताओं से निपटने और धैर्यपूर्वक प्रयत्न जारी रखने के गुण भी कर्म करने वाले मनुष्य के अंदर होना जरुरी है। सफलता के शिखर पर आरुढ़ होने के लिए संकल्पित व्यक्ति यदि अपने प्राचीन मनीषियों के बताये सनातन सूत्रों का इस्तेमाल करते हुए अपने प्रयास जारी रखें तो कोई कारण नहीं कि वे अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल न हों। बहुत सारे लोग सोचते हैं कि बदलते हुए परिवेश में प्राचीन मनीषियों के बताये कर्म-सूत्र कामयाब नहीं हो सकते। किंतु लोगों को यह मालूम होना चाहिये कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने जो भी मार्ग निर्देश दिया है, वह त्रिकाल सत्य वैदिक ज्ञान पर आधारित है जिसके समस्त ऋचाओं का भौतिक, धार्मिक व आध्यात्मिक अर्थ होता है और उनका तीनों क्षेत्रों में उन्हीं अर्थों के अनुरूप उपयोग भी होता है। चौरासी लाख योनियों में मानव शरीर धारी प्राणियों को ही कर्म करने का अधिकार मिला हुआ है। अत: इस विशिष्ट हथियार का इस्तेमाल करते हुए भी मनुष्य अपने किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास कर सकता है। इसलिए मनुष्य को अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए किस प्रकार के कर्म में संलग् होना चाहिए, इसके लिए हमें अपने प्राचीन मनीषियों के बताए सनातन कर्म सूत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए।
 
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Last updated on 19-10-2017
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