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Kundalini Jagran
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यह सम्पूर्ण संसार परमात्मा ने मनुष्य के लिए ही बनाया है, जिसमें वह अपनी सुविधा के अनुसार, अपनी जिंदगी को अपने मन चाहे ढंग से बिता सके। यदि मनुष्य चाहे तो उसके लिए स्वर्ग के द्वार भी खुले हुए हैं, यदि वह चाहे तो नरक के कुएँ में भी बड़ी आसानी से जा सकता है। यदि वह स्वर्ग-नरक से परे पहँचने की चाह रखता है तो उसके लिए मोक्ष का दरवाजा भी पूरी तरह खुला हुआ है। मनुष्य के लिए इस संसार में हर प्रकार की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं, वह आध्यात्मिक साधना कर अपने आप को हर प्रकार के बन्धनों से मुक्त कर सकता है। इसी वजह से परमात्मा ने मनुष्य को कर्म करने के अधिकार से सुसाित किया है और उसे प्रेरणा देने के लिए अनेकानेक प्राणियों व पदार्थों की भी रचना की है जिनको देख कर मनुष्य बड़ी आसानी से सीख सकता है कि इस जिन्दगी को कैसे और बेहतर ढंग से बिताया जा सकता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता की मनुष्य की चाहत भी कई प्रकार की परिस्थितियों की बेड़ियों से जकड़ी हुई है। जब प्रतिकूल परिस्थितियां उग्र रूप में खड़ी हो जाती हैं, तब बड़े-बड़े धुरन्धरों के भी छक्के छुट जाते हैं। किन्तु निराशा का ऐसा अन्धेरा जब छाने लगे तब हमें उसे अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने देना चाहिए। हमें सदैव यह मान कर चलना चाहिए कि जो भी समस्याएं हमारे सामने खड़ी हो रही हैं, वह अकारण नहीं हैं। उनके पीछे हमारी ही कोई गलती छिपी रहती है। अत: हमसे वैसी गलती फिर दुबारा न हो, उसके लिए भी हमें पूरी तरह चौकन्ना रहना चाहिए। उसके लिए हमारे मनीषियों ने एक बहुमूल्य सूत्र दिया है कि परोपकार की भावना से ही कोई कर्म करो और अपने दामन को दूसरों को पीड़ा देने की कालिख से बचाए रखो। यदि हम इस सूत्र को अपनाते हुए कार्य करेंगे तो निश्चित समझिए कि कोई भी समस्या हमें पीड़ित नहीं कर पाएगी। दूसरों को हित पहुँचाने में कोई कष्ट भी मिलता है तो वह कष्ट हमें ऐसे आनन्द से परिप्लावित कर देता है कि उसके आगे इन्द्र का वैभव भी शर्मींदा हो जाए। ऑंखें पसार कर देखिए यह समस्त संसार हमें सही मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रेरणा दे रहा है, लेकिन यह तभी सम्भव हो पाएगा, जब हम स्वयं भी यह ठान लें कि सही मार्ग पर ही हमें अग्रसर होना है। यह संसार एक खुली किताब है और इसमें मनुष्य के हित के लिए ही सब कुछ लिखा है। जड़-चेतन सहित समस्त संसार हमारा हौसला बढ़ाने के लिए हमसे कुछ कह रहें हैं। जरूरत है उसे गौर से सुनने की। एक क्षुद्र कीट भी अपना जीवनयापन करते हुए हमें कुछ सिखला रहा है। उनकी सीख हमारे लिए बहुत अनमोल होती है और आपदा के क्षणों में उनसे जो मिलता है, हमारे लिए बहुत अनमोल सम्बल सिध्द होता है। याद रहे, परिस्थितियों से जो भाग खड़े होते हैं, वे मनुष्य इस जीवन संग्राम में कभी जीत नहीं सकते। इस संसार में हर चीज परिवर्तनशील है। संसार की संसरणशीलता की वजह से ही तो इसे संसार कहते हैं। यहाँ चीजों के बनने और मिटने का क्रम एक ही साथ अनवरत चलता रहता है। फलस्वरूप हमें सुख व दु:ख की अनुभूति साथ-साथ उपलब्ध होती रहती है। परन्तु मुश्किल यह है कि हम सुख ही सुख चाहते हैं, दु:ख नहीं चाहते। हम स्थाई व शाश्वत सुख की कामना से भरे हुए लोग हैं परंतु वह हमें मिल नहीं पाता। किन्तु याद रहे, हमें स्थायी सुख भी मिल सकता है पर वह इसलिए नहीं मिल पाता कि हम जरूरत से ज्यादा बहिर्मुख बन गए हैं और यही मानसिकता हमारी सबसे बड़ी बाधा है। हम शाश्वत सुख की कामना से तरह-तरह के कार्य व साधानाएं सम्पादित करते रहते हैं। निश्चय ही सुख पाने की हमारी यह आकांक्षा हमारे अंदर बीज रूप में जन्म से ही मौजूद रहती है। हमारी जो यह मूल कामना है, वही हमारा सच्चा स्वरूप है क्योंकि यह स्वरूप ही पूरा विकसित होकर हमें आनन्दमय बनाया करता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बाहर की कोई भी सम्पत्ति हमारे भीतर के अभाव को भर नहीं सकती। क्योंकि वह अभाव आंतरिक है, इसलिए भीतर के उस अभाव को बाहर की कोई वस्तु भर नहीं पाती। यही वजह है कि हम अपने जीवन में सब कुछ पाकर भी खाली के खाली ही रह जाते हैं। याद रहे, बाहर से हम कुछ भी पा लें, किसी भी क्षण वह हमसे छीना जा सकता है और जो छीना जा सके, उसे हम अपना कैसे मान सकते हैं? यही वजह है कि बाहरी सम्पत्ति हमें वास्तविक सुरक्षा नहीं दे पाती। उनसे सुरक्षा का केवल भ्रम महसूस होता है। उलटे हमें ही सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के पापड़ बेलने पड़ते हैं। यहाँ इस बात को भली भाँति समझ लेना चाहिए कि बाहर से बटोरी गई कोई भी संपत्ति, सुविधा व शक्ति से न तो हमारा अभाव मिटता है न भय मिटता है और न असुरक्षा मिटती है। वास्तव में जो हमारा मूल अभाव है, वह किसी वस्तु के न मिलने की वजह से नहीं है। हमारी हमेशा यह इच्छा रहती है कि हम हर समय सुखी रहें। संसार में सैंकड़ों मजहब व सामाजिक संस्थाएं हैं जिनका उद्देश्य मनुष्य को सुखी बनाना है। मजहब तो विशेष रूप से मनुष्य को शाश्वत सुख प्रदान करने का दावा करते हैं। किन्तु देखने में आता है कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर मनुष्य शाश्वत सुख पाने में असफल ही रहते हैं क्योंकि वे बाहरी चीजों में उलझ कर जहाँ के तहाँ पड़े रह जाते हैं। इस दुनिया में जन्म लेना एक बात है और इस जीवन को सही तरीके से जीना दूसरी बात। मैं समझता हूं कि संसार में लोग जन्म लेते हैं और बिना सही तरीके से जीये ही मर जाते हैं। झूठे सुखों में उलझे-उलझे ही एक दिन उनकी यह जीवन लीला समाप्त हो जाती है। अत: जन्म पा लेना ही काफी नहीं, जीवन को जीना भी आना चाहिए। सबसे पहले आपके समक्ष मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरा उद्देश्य उस धर्म का प्रचार-प्रसार करना है जो सनातन काल से पूर्ववत बिना किसी रद्दोबदल के चलता आ रहा है और लोगों को शाश्वत सुख पाने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करता रहता है। मैं तो आपके सामने बस कुछ तथ्य रखना चाहता हूँ जिनके आलोक में अग्रसर होने पर मनुष्य अपने ही अंदर जन्म से ही अवस्थित उस प्रसुप्त महाशक्ति को जगाने में सफल हो जाए जिससे उसे शाश्वत सुख के असीम भंडार शिव की उपलब्धि हो जाए जिसकी अनुकंपा से अमृत की बारिश में नहाते हुए कृतार्थ हों स्वयं भी शिव स्वरूप बन जाता है। ये तथ्य किसी मजहब या संप्रदाय के दायरे में कैद नहीं हैं। ये तथ्य समग्र मानव जाति से संबंधित है, प्रत्येक मनुष्य से संबंधित हैं, बिना यह विचार किए कि वह किस धर्म को मानने वाला है या वह किस देश का रहने वाला है। ये तथ्य सार्वभौमिक व सार्वकालिक सत्य से संबंधित हैं, हर मनुष्य के लिए एक जैसे हैं। ये तथ्य मैं आपके ही समक्ष नहीं पूरी मनुष्य जाति के एक-एक इन्सान के सामने रखना चाहता हूँ। जब मैं लोगों के चेहरों पर उभरे भावों को पढ़ता हूँ तो स्पष्ट परिलक्षित होता है कि मनुष्य क्या पूरे प्राणिमात्र की चाहत एक ही जैसी है। हर प्राणी सुख की खोज कर रहा है। हर मनुष्य आनंद की खोज कर रहा है। मगर क्या मनुष्य की यह खोज सही दिशा में हो रही है? नहीं। यही वजह है कि मनुष्य द्वारा खोजा गया हर सुख अंतत: दु:ख में ही तब्दील हो जाता है। मनुष्य खोज तो आनंद की करता है, मगर हाथ उसके विषाद ही आता है। वह चलता तो प्रकाश के लिए है, मगर अंधकार में पहुंच जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि संसार के किसी भी कोने में पैदा हुआ मनुष्य, चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय या मजहब से संबंधित हो, उसकी अंतरात्मा सदैव आनंद की ही खोज में लगी रहती है। भौतिक रूप से हम कुछ भी पा लें, हमारा बुनियादी अभाव मिटता नहीं है। अत: मूल सवाल यह है कि हमारा यह अभाव कैसे मिटे? हम अपने मूल स्वभाव को जो आनंद स्वरूप है, उसे कैसे प्राप्त करें? हमारा मूल स्वभाव अभाव अथवा रिक्ति नहीं है। हम नैसर्गिक रूप से किसी रिक्ति से नहीं बने हैं। हमारा निर्माण आनंद की चरम सीमा और परिपूर्णता की बुनियाद पर हुआ है। तंत्र व योग के महान आचार्यों ने इस बात का संकेत बार-बार दिया है कि कुंडलिनी जागरण की महान विद्या का अवलंबन लेकर ही मनुष्य मूलाधार चक्र के जागरण से शुरु की गई अपनी अंतर्यात्रा को सहस्रार चक्र तक पहुंचा कर अमृत स्वरूप शाश्वत सुख का भंडार जुटाने वाले शिव का सान्निध्य हासिल करने में कामयाब हो सकते हैं। उसके पहले वे दु:ख की दरिया में ही हिचकोले खाते रहने के लिए बाध्य हैं। याद रहे, जिस प्रकार हमारा घर, हमारी देह, हमारी अपनी अस्मिता से भिन्न होते हैं, उसी प्रकार हमारा मन भी हमारे असली अस्तित्व से अलग है और गुरु कृपा से ही अपनी असली अस्मिता की पहचान हासिल होती है। जिस बड़ भागी जीव पर प्रसन्न हो गुरु उसे निज स्वरूप का ज्ञान करा देते हैं, वह परमानंद से सराबोर हो नृत्य करने लगता है। लेकिन गुरु की कृपा तो तभी कार्य करती है जब शिष्य लक्ष्य पाने के लिए कृतसंकल्प हो और गुरु आज्ञा का पालन पूर्ण समर्पित भाव से अनवरत करते रहने के लिए वचन वद्ध हो। कुंडलिनी जागरण के द्वारा बड़ी आसानी से जीव को अपने मूल स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है जिसमें गुरु दीक्षा व शक्तिपात से शिष्य उसके गूढ़ रहस्यों से अवगत हो अपना जीवन सार्थक कर लेता है। शाश्वत सुख पाने के लिए प्रेरणा व प्रोत्साहन देने वाले कर्मफल दाता श्री शनिदेव की कृपा से मुझे जब भी कोई उचित मंच व अवसर प्राप्त होता है लोगों को योग व तंत्र से जुड़ी बातों का न केवल सैध्दांतिक बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी प्रदान करता रहता हूँ। 'कुंडलिनी जागरण' नामक इस पुस्तक में कुंडलिनी जागरण से संबंधित अनेक गूढ़ विषयों की जानकारी दी गई है जो हमारे प्राचीन मनीषियों की एक अनमोल धरोहर है और आज के बदलते युग परिवेश में भी यह पूर्ववत प्रासंगिक है। लेकिन यह विद्या पूरी तरह गुरु कृपा गम्य है। अत: इसकी साधना जीवंत गुरु के सान्निध्य में ही की जानी चाहिए। इस पुस्तक की मौलिकता पर मेरा कोई दावा नहीं है क्यों कि यह हमारे प्राचीन मनीषियों व सनातन गुरु परंपरा से प्राप्त ज्ञान के आलोक में लिखी गई है। यदि इस पुस्तक के अनुशीलन से पाठकों के ज्ञानवर्ध्दन में जरा भी सहायता मिली तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा। पुस्तक आपके हाथों में है। अत: इसके संबंध में मुझे कुछ भी नहीं कहना है।
 
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Last updated on 19-10-2017
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