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Daati gurmantra ke upay part - 9(General Upay)
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आज की व्यस्तता भरी जीवन शैली में किसी के पास चैन की दो सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। लोग अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं को बढ़ाने के लिए जी-जान से लगे हुए हैं। अपने जीवन के परमोद्देश्य को उपलब्ध करने के लिए किसी के पास समय नहीं है। लेकिन याद रहे, जबतक आभ्यंतरिक सुख-शांति से हमारा जीवन सराबोर नहीं होता तबतक हम सही मायने में चैन की एक सांस भी नहीं ले सकते। सांसारिक भोगों के लिए हम इतने लालायित हो जाते हैं कि उसके अतिशय भोग के दुष्परिणामों पर ध्यान नहीं देते। सच कहिए तो परमात्मा ने हमें मनुष्य का शरीर एक खास मकसद से दिया है। यह एक ऐसा शरीर है जिसमें चुनाव करने व कर्म करने की विशिष्ट क्षमता है। इस विशिष्ट क्षमता का उपयोग करते हुए मनुष्य एक विशेष साधना का भी संपादन कर जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा पा सकता है। जन्म-मरण के चक्र को ही भव-चक्र भी कहते हैं, जिसमें हिचकोले खाना सभी दुखों से बड़ा माना जाता है। यही वजह है कि सर्वप्रथम मैं अपने प्रवचन में लोगों को आध्यात्मिक साधना करने के लिए प्रेरित करता हूं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि उस साधना में सफलता एकाएक हासिल नहीं हो जाती। इस दौरान मनुष्य को नाना प्रकार की भौतिक प्रतिकूलताओं व आधि-व्याधियों से जूझना पड़ता है। इन सांसारिक बाधाओं की पीड़ा से विचलित मनुष्य कभी भी अपने जीवन के परम ध्येय को पाने की साधना का समुचित अभ्यास नहीं कर पाता।
 
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Last updated on 27-06-2017
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