क्या होते हैं मंत्र या स्तोत्र

 

हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में बड़े विस्तार से मंत्रों का जिक्र आया है जो अब धीरे-धीरे विस्मृति के अंधकार में खोते जा रहे हैं। मंत्रों में इतनी शक्ति है कि इनके द्वारा उन सभी असाध्य रोगों व विघ्रों से भी मुक्ति मिल सकती है जो सामान्य औषधियों या उपायों से समाप्त नहीं होते। स्थूल दृष्टि से विचार करने पर तो पता चलता है कि मंत्र कुछ शब्दों व अक्षरों के समूह मात्र होते हैं और यह आवश्यक नहीं कि उन शब्दों का कुछ अर्थ भी निकले। किंतु उन शब्दों के संयोजन क्रम व उच्चारण से प्रसारित दिव्य तरंगों की शक्ति इतनी प्रबल व अमोघ होती है जिससे दूरस्थ पदार्थ व व्यक्ति भी प्रभावित हो जाता है। मंत्रों में प्रयुक्त शब्दों की दिव्य शक्ति को कौन कहे, आधुनिक भौतिक विज्ञान की शब्दावली में प्रयुक्त ध्वनि तरंगों में छिपी अपार क्षमता के रहस्य पर से भी परदे हटते जा रहे हैं और ध्वनि के उपयोग से न केवल औद्यौगिक क्षेत्र में विस्मयजनक कार्य संपादित हो रहे हैं बल्कि चिकित्सा जगत में भी इसका धडग़े से उपयोग किया जा रहा है।

 शब्दों व स्वरों के विशिष्ट संयोजन से सृजित संगीत के विविध रोगों व सुरतालों से निकलने वाली तरंगों का जो स्थूल व सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है, इसका अनुभव तो हमें आये दिन होता रहता है। कुछ जाने-माने संगीतज्ञों के संगीत से मनुष्य ही नहीं, पशु तक भी सम्मोहित हो जाते हैं। संगीत-साधना में सिद्घ गायकों द्वारा गाये-बजाये गये रागों में इतनी शक्ति होती है कि इनके प्रभाव से वर्षा, आंधी व अग्रि आदि का भी प्रादुर्भाव हो सकता है। शब्दों के उच्चारण से विशिष्ट तरंगें पैदा होती हैं जो समस्त वस्तुओं को प्रभावित करती हैं। ये तरंगें हमारे शरीर को भी प्रभावित करती हैं और इन्हीं का तरीके से प्रयोग कर रोगों व विघ्रों का शमन भी संभव होता है। ठोस पदार्थों की तुलना में द्रव और द्रव की तुलना में गैस का प्रसारण तो तेजी से होता है। क्योंकि ठोस से द्रव और द्रव से गैस सूक्ष्म होती है, साथ ही बहुत ही जल्दी फैलने वाली होती है और अपना असर और भी शीघ्रता से दिखाती है। इस बात को मिर्च के उदाहरण से समझा जा सकता है। मिर्च जब ठोस अवस्था में रहती है तो उसके तीखेपन की गंध बड़े सीमित  स्थान तक महसूस होती है। किंतु मिर्च के जलकर गैस रूप में बदलते ही पूरा वातावरण उसके तीखेपन से भर उठता है। शब्द से उत्पन्न ध्वनि तरंगें तो गैस से भी सूक्ष्म होती हैं जो और अधिक व्यापकता व शीघ्रता से अपना असर दिखाती हैं। शब्दों के उच्चारित होते ही उससे पैद हुए कंपन अनन्त ब्रह्मांड में चक्कर लगाकर इतनी जल्दी किस प्रकार वापिस आ जाते हैं और हमें प्रभावित करते हैं, इसका हमें एहसास भी नहीं होता। इस भ्रमण के समय ये अपने अनुकूल कंपनों के गुणों को भी अपने में समाहित करती हुई आती हैं।

 शब्द में अपरिमित शक्ति सन्निहित है। शाों में जिस परम सत्ता को ‘शब्द ब्रह्म’ कहकर इंगित किया गया है, वह उस अनादि स्पंदन को ही लक्ष्य कर कहा गया है जिसके फलस्वरूप यह अखिल विश्व अस्तित्व में आया है। हमारा भौतिक समाज आज इसके प्रभाव को सीधे रूप से भले न मानें, पर आज पृथ्वी के किसी एक सुदूर भाग में पैदा हुई ध्वनि तरंगें दूसरे भाग में इतनी शीघ्रता से पहुंच जाती हैं, ये इनसे पैद तरंगों की अपरिमित शक्ति का ही प्रभाव नहीं तो और क्या है? हमारे ऋषियों-मुनियों ने शब्द को आत्मसात किया, इसके महत्व व प्रभाव को गहरे में जाकर खुद महसूस किया और तभी उसे ‘ब्रह्म’ कहा। हम मानें या न मानें पर शब्दों की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। आखिर इन्हीं शक्तियों के कारण ही तो हम संगीत की ओर आकर्षित होते हैं जिससे हमारे मस्तिष्क को शांति व सुकून मिलता है। इन्हीं शब्दों का आध्यात्मिक रूप मंत्र होते हैं जिनके द्वारा असाध्य रोगों व समस्याओं से मुक्ति पायी जा सकती है।

जैन दर्शन के अनुसार अनुष्ठान के अर्थों का स्मरण दिलाने वाला वाक्य ‘मंत्र’ कहलाता है जबकि मीमांसा दर्शन के अनुसार - प्रयोग से समवेत वस्तुओं का बोध कराने वाला वेदभाग मंत्र है। यजुर्वेद : संहिता (24-20) के अनुसार ‘अभिधरस्य चोदकेस्वेवं जातीय केष्वभियुक्ता उपदिशन्ति मंत्रनधीमहे’ अर्थात जो वचन यज्ञ में अनुष्ठनीयमान कर्म को करने वाले हैं, उन्हें मंत्र कहा जाता है।

 ‘मन्त्र’ शब्द में ‘अच्’ प्रत्यय लगाने से ‘मंत्र:’ शब्द की निष्पत्ति होती है जिसका अर्थ किसी भी देवता को संबोधित किया गया वैदिक सूक्त, विनय प्रार्थना वाले स्तोत्र व ऋचाएं हैं। कालांतर में इसके अर्थ का दयरा बढ़ता गया और तरह-तरह के प्रयोजनों को सिद्घ करने, कष्टों का निवारण करने या समस्याओं का हल करने के निमित्त उपयोग में लायी जाने वाली सिद्घ पुरुषों द्वारा अनुभूत उन विशिष्ट शब्द संयोजनों व छंदें में बंधे वैदिक, पौराणिक व लौकिक शब्द समूहों को भी ‘मंत्र’ कहा जाने लगा जिनसे किसी समस्या का हल होता है या जिससे कोई दैवी शक्ति प्रसन्न होती है। आचार्य आपस्तम्ब के अनुसार ‘मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’  यानी ब्रह्म के समान सर्वोच्च सत्ता को मंत्र कहते हैं जो शब्द राशि अलौकिक अर्थ प्रतीत कराती है, जो नियत स्वर तथा वर्ण क्रम वैशिष्ट्य से युक्त हो और जिसे गुरु-शिष्य परंपरा से प्राप्त कर उच्चारण कर किसी नियत उद्देश्य की पूर्ति की जाती है।

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Last updated on 11-12-2017
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