निज सत्यस्वरूप से जुड़ाव और असली बुद्घिमत्ता
मित्रो, इस संसार में सभी मनुष्य एक ही प्रकार के नहीं हैं। रंगरूप में भिन्नता तो होती ही है, लोगों के मन भी अलग-अलग प्रकार की चीजों को पसंद करते हैं। किसी को मीठा पसंद है तो किसी को तीता। जिसे जो भी पसंद है, उसकी उपलब्धि होने पर खुशी मनाता है और जो नापसंद है उसे पाने पर ना खुशी जाहिर करता है। इस संसार में हमारे लिए क्या करना उचित है और क्या करना उचित नहीं है, इसके भी अलग-अलग मापदंड बने हुए हैं। उन्हीं मापदंडों के आधार पर समाज के अनेक कायदे-कानून बने हुए हैं। इनका पालन करना लोगों के लिए आवश्यक माना गया है। कुछ लोग तो इन कायदों के प्रति इतने सख्त होते हैं कि लोगों को पहले से ही हिदायतें देते रहते हैं कि इन कानून-कायदों का उल्लंघन न हो। आश्चर्य तो तब होता है कि कानून के ये तथाकथित पहरेदार कभी-कभी भविष्य में इन कानूनों के उल्लंघन होने की संभावना पर भी पहले ही लोगों को दण्डित कर देते हैं।
इस संसार का काम कैसे चलाएं, इसके लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है। लोग पाठशालाओं में बच्चों को पढऩे के लिए भेजते हैं ताकि उनका बौद्घिक विकास हो। स्कूल कालेजों में मनुष्य को शिक्षित किया जाता है, उन्हें बुद्घिमान बनाने का प्रयत्न किया जाता है। लेकिन एक अन्य प्रकार की भी बुद्घिमत्ता होती है जो सांसारिक बुद्घिमत्ता से अलग है, भगवान श्री कृष्ण उस बुद्घिमत्ता की ही बात अर्जुन से करते हैं जिसका भगवद्ï गीता में उल्लेख मिलता है। वे कहते हैं, जब कोई व्यक्ति आभ्यंतरिक दुनिया में अपने मन को उन्मुख करते हुए अग्रसर होता है तब वह अपने निज सत्यस्वरूप से जुड़ जाता और वह अपने आप में स्पष्टï हो जाता है कि वह परमात्मा का ही अंश है। उस स्थिति में पहुंचने पर ही उसे असली बुद्घिमत्ता का पता चलता है कि वास्तव में बुद्घि क्या है।