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Daati gurmantra ke upay part - 1(Genral Upay)
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इस संसार में जो कुछ भी होता है परमपिता परमात्मा की कृपा से ही सम्भव हो पाता है। यह पुस्तक भी उन्हीं के कृपा-प्रसाद से आपके हाथों में पहुंच पाई है। मेरे आराध्यदेव श्री शनिदेव हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। यही वजह है कि मैं अपने नाम के आगे शनिचरणानुरागी लिखते हुए अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता हूँ। साथ ही लोगों को 'ॐ शं शनैश्चराय नम:' का जाप करते हुए अपने दु:ख-दर्द मिटाने का सरल संदेश सर्वत्र सुनाया करता हूँ। श्री शनिधाम में पधारने वाले श्रध्दालु शनिभक्तों को मैं यही संदेश देता हूँ कि मैं कोई देवदूत नहीं, एक सामान्य व्यक्ति हूँ जिसने अपने आराध्यदेव के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं तो मुझसे नहीं श्री शनिदेव से जुडें। अाप लोग अपनी समस्या अथवा मनोरथ बिना किसी को बताए लगातार ग्यारह शनिवारों को खुले हृदय से श्री शनिदेव की पूजा व तैलाभिषेक करें और उससे ही आपकी हर प्रकार की समस्याओं का समाधान हो जाएगा तथा आपके मनोरथ भी पूरे हो जाएंगे। केवल जरूरत है हृदय में श्री शनिदेव के प्रति पूर्ण श्रध्दा व विश्वास की। मैंने प्रारम्भ में लगातार एकादश शनिवार को आने वाले श्रध्दालुओं को नियमित रूप से शनि भक्ति का संदेश सुनाया था जिसे पुस्तककार में प्राप्त करने की मांग काफी दिनों से हो रही थी। श्रध्दालुओं की उस मांग को पूरा करने के लिए मैंने अपने गुरुमंत्र व्याख्यान माला के सम्बोधनों, उपायों व नुसखों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने के लिए सैटर्न पब्लिकेशन को अधिकृत कर दिया। प्रसन्नता की बात है कि बहुत ही कम समय में पब्लिकेशन ने वह काम सम्पन्न कर दिया। चूंकि यह पुस्तिका आपके हाथों में मौजूद है, अत: इसके सम्बंध में मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है। यह मेरे आराध्यदेव की प्रेरणा व अनुकम्पा से बने श्री शनिधाम में शनि उपासना के लिए पधारने वाले भक्तों को प्रारम्भिक एकादश शनिवारों की गोष्ठी में किए गए सम्बोधनों और बताए गए सरल उपायों व नुसखों से भरे कलश के समान है, जिसमें संजोये मर्म-स्पर्शी विचारों से लोगों के जीवन में अप्रत्याशित रूप से आने वाले दु:खों की जलन पर एक सुखद औषधीय लेप की अनुभूति प्रदान करता है। उससे आने वाले भक्तों के दिलों में सुख-शांति व सुकून की प्राप्ति होती है। लेकिन वास्तव में ये सभी सम्बोधन मेरे द्वारा अपने आराध्यदेव के प्रति आभार प्रदर्शन की एक अनूठी विधा है जिसे श्री शनिदेव का स्तुति-गान भी कहा जा सकता है। शास्त्रों में स्पष्ट घोषित किया गया है कि लोगों को कर्मफल प्रदान करने के लिए जगतपिता जनार्दन ने ही ग्रहों का स्वरूप धारण किया है। यह सम्पूर्ण जगत ग्रहों के अधीन है और श्री शनिदेव प्रथम ग्रह हैं। यथा - ''जनानां कर्म फलदो ग्रह रूपी जनार्दन। ... ग्रहाधीनां जगत सर्वं शनिस्तु प्रथमो ग्रहा॥'' जाहिर है मेरे आराध्यदेव कर्मफलदाता हैं जो जीवों के पूर्वकृत कर्मों का फल प्रदान कर उनके कर्मों की बेड़ी समाप्त करने का अति महत्वपूर्ण कार्य संपादित करते हैं। उससे जीवों को जन्म-मरण के सनातन भवचक्र से मुक्ति पाने का सुअवसर आसानी ये उपलब्ध हो पाता है। मेरे आराध्य श्री शनिदेव दया व अनुकम्पा के अथाह महासागर हैं जिनके आश्रय में आने पर सबका कल्याण ही होता है। यदि किसी वजह से शनिभक्तों को कभी-कभी कष्ट भी मिल जाता है तो उस कष्ट के गर्भ में भी उस जीव विशेष का बहुत बड़ा कल्याण छिपा रहता है। मेरे आराध्य श्री शनिदेव ग्रहों की अदालत में सर्वोच्च न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हैं और जीवों के पूर्वकृत कर्मों का फल प्रदान कर उनकी मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करते रहते हैं। इस पुस्तक को पढ़कर आप लाभ उठाना शुरू करें, उसके पहले मैं चाहता हूँ कि आपके समक्ष अपने आराध्यदेव के सम्बन्ध में कुछ और भी निवेदित करता चलूँ। मैं आज जो भी हूँ अपने आराध्यदेव की अनुकम्पा से हूँ और आगे जो कुछ भी हो रहा है व होगा, उन्हीं की कृपा की बदौलत सम्पन्न होगा। लोग मुझे 'दाती' कहते हैं तथा नाना प्रकार के अन्य विशेषणों से भी अलंकृत करते रहते हैं। किन्तु तथ्य यह है कि वास्तविक 'दाती' तो श्री शनिदेव हैं! और उन्हीं की कृपा से संसार के सृजन, पालन व संहार आदि के समस्त कार्य अनवरत संचालित होते रहते हैं। मैं अपने आराध्यदेव के कर्मफलदाता स्वरूप को ध्यान में रखते हुए ही परहित व परोपकार के कार्यों में खुद को संलग् रखता हूँ। साथ ही अन्य लोगों को भी परहित व परोपकार के लिए प्रेरित करता रहता हूँ। इसमें मेरा कुछ बड़प्पन नहीं बल्कि सब मेरे इष्टदेव की कृपा की बदौलत ही सम्भव हो पा रहा है। निराश्रितों और उपेक्षितों की सेवा में मेरा बहुत सारा समय व्यतीत होता है किन्तु यह सब उन्हीं की कृपा का फल है वरना मेरे जैसे तुच्छ जीव से इस प्रकार के बड़े-बडे कार्य कैसे हो पाते। मैं अकसर बताया करता हूँ कि मेरे आराध्यदेव हर प्रकार की परिभाषाओं व सीमाओं से परे हैं तथा कोई भी व्यक्ति उनके सम्पूर्ण गुणों का बखान नहीं कर सकता। मेरे आराध्यदेव इस संसार में परस्पर विरोधी समझे जाने वाले गुणों से भी परिपूर्ण हैं। इसलिए उनकी महिमा को समझ पाना सामान्य बुध्दि वाले लोगों के लिए सम्भव नहीं है। सुख-दु:ख, पुण्य-पाप, दिन-रात, सृजन-प्रलय और सुयोग-कुयोग आदि विशेषण दुनिया में भले ही परस्पर विरोधी समझे जाएं किन्तु मेरे आराध्यदेव तो पूरी तरह इनसे ऊपर हैं। वे अपरिभाषेय हैं! निराकार-साकार, निर्गुण-सगुण, विषम--सम सब कुछ वहीं हैं! क्योंकि वे पूर्ण हैं! और पूर्ण का अर्थ भी यही होता है कि उसमें किसी भी प्रकार की कमी न हो। यदि किसी के अन्दर दोषों का भी अभाव हो तो उसे गुणवान भले ही कहा जाए किन्तु उसे पूर्ण कदापि नहीं कहा जा सकता। पूर्ण तो वही होता है जो गुण व दोष दोनों से परिपूर्ण हो। जिस प्रकार शास्त्रों में शिव की बारात का जिक्र आता है उसमें उनके हर प्रकार के गणों का उल्लेख मिलता है। उनका कोई गण अति सुन्दर है तो कोई अति कुरूप! कोई काला है तो कोई गोरा! कोई एक मुख वाला तो कोई अनेक मुख वाला! कोई बिना सिर के है तो कोई बिना पैर के ही बारात में शामिल है। लेकिन भगवान शिव अपने सभी बारातियों को आदर समेत अपनी बारात में शामिल किए रहते हैं। उनके लिए न तो कोई अधिक प्यारा होता है न कोई घृणास्पद! वह तो कृपा के सागर होते हैं और सबको अपने आश्रय में समान रूप से अंगीकार करते हैं। इस प्रकार का गुण किसी जीव में नहीं बल्कि अनन्त ऐश्वर्य के स्वामी सदाशिव में ही मौजूद रह सकते हैं जो पूर्ण कहे जाते हैं। मेरे आराध्यदेव श्री शनिदेव हैं और उन्हें भी सदा शिव का भक्त होने का गौरव प्राप्त है। शिव की तरह श्री शनिदेव भी अपने भले-बुरे हर प्रकार के भक्तों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। मेरे आराध्यदेव पूर्ण हैं! वे किसी भी प्रकार की पूर्णता: से वंचित नहीं है। आखिर पूर्ण उसे ही कहा जाता है जिसमें किसी भी प्रकार की कमी न हो। सच कहिए तो, गुण व दोष का आकलन हम सांसारिक मानसिकता के जिस धरातल पर बैठ कर करते हैं वह इस संसार की संकुचित मानसिकता में जकड़ी रहती है। जब हम इस धरती पर खड़े रहते हैं और कोई चिड़िया आकाश में उड़ती है तो कहते हैं कि चिड़िया नीचे थी अब ऊपर उड़ गई। किन्तु यदि खगोल की दृष्टि से विचार किया जाए तो वह चिड़िया ऊपर या नीचे नहीं कही जा सकती क्योंकि वह पृथ्वी के केन्द्र से दूर भले ही जा रही हो किन्तु अंतरिक्ष के पैमाने पर ऊपर-नीचे, पूर्व-पश्चिम आदि बातों की कोई अहमियत नहीं। उसी प्रकार मेरे आराध्यदेव की महिमा को सांसारिक पैमाने पर मापा नहीं जा सकता है। मैं जिस महामंत्र 'ॐ शं शनैश्चराय नम:' को संसार के हर प्रकार की प्रतिकूलताओं व बाधाओं के शमन का अमोघ उपाय के रूप में प्रचारित करता हूँ, उसका पहला अक्षर 'शं' है जो सदाशिव के पर्याय 'शंकर' शब्द का पहला वर्ण है। शंकर शब्द की व्युत्पति करते हुए स्पष्ट किया गया है कि 'शं करोति इति शंकर:' यानी जो कल्याण करता है वही शंकर है। इसलिए शं का अर्थ कल्याण होता है और इस मंत्र में मेरे आराध्यदेव श्री शनिदेव को कल्याणकारी कहते हुए उनको नमस्कार निवेदित किया गया है। वैसे तो हमारे शास्त्रों में श्री शनिदेव की अनुकम्पा पाने के लिए अनेकानेक मंत्रों व स्तोत्रों का उल्लेख है। किन्तु मुझे उनका यह सरल लघु मंत्र अत्यन्त प्रिय है और इसका प्रभाव इतना व्यापक है कि इसे महामंत्र कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है। श्री शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए अनेकानेक स्तोत्र हैं किन्तु दशरथकृत शनिस्तोत्र की महिमा का बखान नहीं किया जा सकता क्योंकि उस स्तोत्र को मेरे आराध्यदेव श्री शनिदेव ने स्वयं गरिमा प्रदान करते हुए घोषित किया था कि भविष्य में जो भी इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा वह हर प्रकार की प्रतिकूलताओं व बाधाओं से मुक्त हो सुख-सुकून की सुगंध से अपने जीवन को सुभाषित करने में सफल होगा। मेरे आराध्य श्री शनिदेव, जिन्हें पुराणों में भगवान विष्णु के रामावतार के ग्रह स्वरूप सूर्य का पुत्र बताया गया है, वे स्वयं भी भगवान विष्णु के कूर्म अवतार के ग्रह स्वरूप हैं। इस प्रकार वंशानुगत गुणों को भी देखा जाए तो उनमें हर प्रकार के तेज और संसार के भरण-पोषण की प्रवृत्ति का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। किन्तु अल्पज्ञतावश लोग उनके प्रभावों के मर्म को समझ नहीं पाते। इसी वजह से उन्हें क्रूर व कुटिल कहने की एक गलत परिपाटी चलन में आ गई है जो पूरी तरह गलत है। अपने पिता सूर्य की आज्ञा से तपस्या कर मेरे आराध्यदेव ने शिव को प्रसन्न कर ग्रहों की अदालत में जो महत्वपूर्ण पद प्राप्त किया वह कोई साधारण बात नहीं। ऐसे तेजस्वी व क्षमता से युक्त मेरे आराध्यदेव पर अमंगलकारी होने का जो आरोप लगाया जाता है, वह पूरी तरह गलत है। उनके ऊपर कर्मफलदाता होने का जो दायित्व सौंपा गया है, उसे पूरा करते हुए बिना किसी पक्षपात के हर जीव का परम कल्याण करने के महान कार्य में वह सदैव लगे रहते हैं। अपने दायित्व को पूरा करने के लिए वे निर्जन से निर्जन स्थानों में पहुंच जाते हैं। घृणित से घृणित प्राणियों के कल्याण के लिए भी वे उनका कर्मफल प्रदान कर उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने में जरा भी देर नहीं लगाते। लेकिन उनके कल्याणकारी कार्य लोगों को ध्वंसात्मक व अमंगलकारी लगते हैं। मैं सच कहता हूँ मेरे आराध्यदेव के उस ध्वंस के अंदर भी नवसृजन का अंकुर छिपा रहता है, उस अमंगल के मूल में भी मंगल छिपा रहता है। लेकिन उसे सामान्य दृष्टि वाले सांसारिक व्यक्ति समझ नहीं पाते। उसे समझ पाने के लिए गूढ़ ज्ञान की जरूरत होती है जो उन्हीं की कृपा से लोगों को प्राप्त हो पाता है। इसीलिए मेरे आराध्यदेव को कर्मफलदाता के साथ-साथ मुक्तिदाता भी कहा गया है। श्री शनिदेव जब किसी जातक के पूर्वकृत अशुभ कर्मों का फल प्रदान करते हुए देखने में ध्वंसात्मक कार्य करते हुए दिखें, जिसे सामान्य भाषा में शनि का प्रकोप कहा जाता है, उस ध्वंस के अंदर श्री शनिदेव की कृपालुता व सृजनशीलता का अनुग्रह भी छिपा रहता है। कर्मफल भुगतान के माध्यम से जीवों के कर्मों की बेड़ियां कटती हैं। मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। देखने में भले ही उसकी घर-गृहस्थी न बस पाती हो किन्तु जब वह संन्यास ले मुक्ति के मार्ग में अग्रसर हो जाता है तब उस घर उजड़ने वाले ध्वंस के साथ उस व्यक्ति को एक दुर्लभ अवसर का विशेष अनुग्रह भी प्राप्त होता है। यह सब श्री शनिदेव की कृपा से ही होता है। श्री शनिदेव की स्तुति करते हुए महाराज दशरथ ने उनके जिन अद्भुत स्वरूप व गुणों का वर्णन किया है उसे भी सामान्य बुध्दि से नहीं समझा जा सकता। उसमें उनके जिन स्वरूपों का वर्णन है उसे भली-भाँति न समझ पाने की वजह से ही लोगों के मन में श्री शनिदेव की एक भयंकर सी छवि बैठ गई है जो दिन ब दिन विकृत होती जा रही है। इस प्रक्रिया को जारी करने में उन लोगों को श्री शनिदेव से डराकर धन ऐंठने का धंधा खोल रखा है। ऐसे लोगों ने मेरे आराध्यदेव पर कीचड़ उछालने का कार्य जारी किया है, जो अक्षम्य है। मैंने उनके द्वारा फैलाये भ्रमों का निवारण करने की एक मुहिम सी छेड़ रखी है। लोगों के अंदर श्री शनिदेव की विकृत छवि अज्ञानता की वजह से ही बैठी है जो सनातन गुरु परम्परा से प्राप्त गूढ़ ज्ञान के आलोक में ही भली-भाँत हृदयंगम हो पाती है। इसलिए इस पुस्तक का अनुशीलन करने के पहले श्री शनिदेव की महिमा को खुले हृदय से स्वीकार करना आवश्यक है। तभी उनकी अनुकम्पा का पूरा लाभ उठाया जा सकता है। यदि आपको मेरे आराध्यदेव की अनुकम्पा का पूरा लाभ उठाना है तो मेरे आराध्यदेव को मेरी ही दृष्टि से देखना होगा। चलते-चलते एक बात और भी स्पष्ट कर दूं कि मैंने अपने आराध्यदेव के सम्बन्ध में जो भी बातें कहीं हैं, वे मेरे हृदय के उद्गार हैं और उनको रिझाने के लिए बताए गए उपायों को मैंने स्वयं अनुभव किया है, साथ ही अन्य लोगों को भी उससे लाभ उठाते हुए देखा है। शास्त्रों में इस बात का कई प्रसंगों में जिक्र किया गया है कि श्री शनिदेव जितनी सरलता से रिझ जाते हैं, उतनी सरलता से शायद ही कोई देव रिझते हों। इसी वजह से इस कलि काल में उनकी उपासना को सबसे सरल व श्रेष्ठ उपासना मानता हूँ और लोगों को उनकी उपासना के लिए प्रेरित भी करता हूँ। उन्हें प्रसन्न करने के उपायों में सबसे सरल उपाय परोपकार में संलग् रहना तथा दूसरों को पीड़ा पहुंचाने के दाग से अपने आप को बचाए रखना है। और यदि कोई व्यक्ति दृढ़ निश्चय से श्री शनिदेव को प्रसन्न करने के मार्ग पर अग्रसर होना चाहता है तो उसके लिए सुअवसर हर समय मौजूद रहते हैं। आज की भाग-दौड़ वाली जिन्दगी में अपने लोक-परलोक को सुख-शांति से भरपूर करने का यह एक बड़ा ही सरल व सहज मार्ग है। ज्यादा कुछ क्या कहूँ, श्री शनिदेव की पूरी महिमा का बखान करना मेरे जैसे तुच्छ प्राणी के लिए असम्भव है।
 
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Last updated on 12-12-2017
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