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Ek Shashwat Khoj
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एक शाश्वत खोज 'एक शाश्वत खोज अपने अस्तित्व के आलोक की' नाम से प्रकाशित यह पुस्तिका मेरे कतिपय व्याख्यानों का संकलन है जिनमे मानव-मन में उठने वाले उस सनातन जिज्ञासाओं का शमन करने की चेष्टा की गयी है जो अनादि काल से मनुष्य को झकझोरते रहे हैं और जब तक मनुष्य की उन जिज्ञासाओं की व्यावहारिक रूप से शांति नहीं हो जाती तबतक वह चैन से बैठ नहीं पाता। जब से हमने होश संभाला है, अपने आपको नाना प्रकार के सवालों से घिरा हुआ पाया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम वास्तव में कौन हैं जिसे नाना प्रकार के सवालों का उत्तर चाहिए। हमारे अपने अस्तित्व का वह आलोक कैसा है जिसमें हमें नाना प्रकार के सवालों का उत्तर तलाशने के लिए लगातार व्यग्र होना पड रहा है। संसार में मौजूद अन्य चीजों के संबंध में उठने वाली जिज्ञासाएं तो तब उठतीं हैं जब हमारा अस्तित्व है। इसलिए सबसे पहले हमें अपने अस्तित्व को तलाशना हैं क्योंकि वही बुनियादी सत्य है जिसकी बदौलत हमें नाना प्रकार के प्रश्ाें व समस्याओं से उलझना पड़ रहा है। सच कहिए तो हम सभी अनादि काल से एक शाश्वत खोज में लगे हैं कि हमारा अपना अस्तित्व कैसा है जिसके आलोक में अनेकानेक जिज्ञासाएं लगातार पनपती रहती हैं और हम उन्हीें के शमन के लिए सदैव जाने-अनजाने सचेष्ट रहा करते हैं। हम सबके लिए हमारा अपना अस्तित्व ही अति महत्वपूर्ण है क्योंकि वही बुनियादी सत्य है जिसका अहसास हमें सबसे पहले हुआ। हमारा अपना सनातन अस्तित्व ही प्रमाणित करता है कि हम सनातन सर्वोच्च सत्ता के ही अंश हैं जो अति पुरातन होते हुए भी चिर नवीन है। न तो उसके जैसा कोई पुराना हो सकता है, न उसके जैसा कोई नवीन। वह परमसत्ता ही परमसत्य व परम चैतन्य है। हमारी अपनी चेतना ही प्रमाणित करती है कि वह सर्वोच्च सत्ता ही परम चैतन्य है, चेतना का बुनियाद स्रोत है। इसलिए उसमें किसी प्रकार की जड़ता की उम्मीद करना अपनी मूर्खता ही प्रदर्शित करना है। वह सत्य अपना बाहरी रूप रोज-रोज बदल रहा है। रोज क्या, प्रतिपल वह नया रूप धारण करता है। क्योंकि वह किसी जड़ वस्तु की तरह हमेशा एक ही रूप मे स्थिर नहीं रह सकता। वह चेतन है, इसलिए उसके रूप में भी चैतन्य प्राणियों की तरह नैसर्गिक रूप से बदलाव आता रहता है। इसलिए मैं कहता हूं कि हम अपने जिस अस्तित्व के सत्य स्वरूप की खोज मे निकले हैं तो हमें पहले से ही कोई कल्पित खाका बनाकर नहीं चलना चाहिए कि वह अमुक प्रकार का होगा। जब भी कोई खोजी उसक ी खोज में निकले तो इस बात को मानकर चलें कि वह जब उसे उपलब्ध होगा तो उस समय वह कैसा होगा उसके बारे में पहले से ही कोई अंदाजा नहीं लगया जा सकता। क्योंकि वह उस परमसत्य का अंश हैं जो परम चैतन्य है और चैतन्य सदैव एक ही आकार-प्रकार के सांचे में कैद नहीं रहता। जब कृष्ण ने उसे खोजा तो उसे अन्यरूप में पाया, अर्जुन ने किसी अन्य रूप में पाया। क्राइस्ट और महावीर ने भी उसका साक्षात्कार किसी अन्य रूप में किया। कबीर और मीरा आदि ने उसे किसी अन्य रूप में उपलब्ध किया। किंतु तथ्य यही है कि सबने एक ही सत्य का साक्षात्कार किया था। इसलिए मैं लोगों से हमेशा अनुरोध किया करता हूं कि वे कभी भी कोई पुराना पैमाना लेकर, कल्पना की कोई कसौटी लेकर अपने अस्तित्व के आलोक की खोज में न निकल पड़ें। क्योंकि वे पैमाने व कसौटियां किसी उपयोग में नहीं लायी जा सकेंगी। एक बात और है कि अपने अस्तित्व के अनुभव को खुद प्राप्त किया जाता है और वह किसी को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, किसी अन्य के उनभव को आधार बनाकर भी अपने अस्तित्व के अनुभव को कभी कोई माप नहीं सकता। वह पूरी तरह निजी रूप से प्राप्त की जाती है। किंतु उसे प्राप्त करने की युक्ति समय के सच्चे संत के सान्निध्य में जाने से ही उपलब्ध हो पाती है। इसलिए इस कार्य में सबसे पहले जरूरत यह है कि समय के सच्चे संत की तलाश की जाये। लोगों को सच्चे संत को पहचानने में भी बडी दिक्कत होती है क्योंकि इस संसार में अनेकानेक लोग संतों के रूप में मौजूद हैं। अत: उनमें से सच्चा संत कौन है, इसका निर्णय करने में भी लोगों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में भी सही मार्गदर्शन दिये जाने की जरूरत है। लोग यह सवाल भी बार-बार पूछा करते हैं। अत: इस पुस्तिका के अंत में वैसे प्रसंगों को भी जोड़ दिया गया है जिसमें उक्त बिंदु पर भरपूर प्रकाश डाला गया है। यदि लोगों को इस पुस्तिका के अनुशीलन से अपने अस्तित्व के आलोक की तलाश करने में जरा भी सहायता मिली, तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा।
 
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Last updated on 22-04-2018
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