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Antar Ke Pat Khol
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मनुष्य का मन हमेशा सुख की चाह में इधर-उधर भटक रहा है। मनुष्य के सारे प्रयत्न भी सुख प्राप्त करने की दिशा में ही होते हैं। ये सुख शारीरिक तथा मानसिक दो प्रकार से अनुभव किए जाते हैं। परन्तु प्रयत्नों के पश्चात भी दुख की प्राप्ति होती है, जबकि मनुष्य इस आशा से उपरोक्त प्रयत्न करता है कि अब उसे सुख निश्चित रूप से प्राप्त होगा। अत: असफल होने पर वह कभी अपने भाग्य को, कभी भगवान को, कभी ग्रहों को और कभी दूसरों को दोष देता है। इस स्थिति से बचने का एक ही उपाय है कि वह प्रयत्न करता रहे, क्योंकि यही उसके अधिकार में है और कर्म करने की क्षमता भी भगवान ने दी है। मनुष्य को सुख और दुख दोनों के लिए पहले से ही तैयार रहना चाहिए। ये दोनों अविभाज्य हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनसे मुक्त होने के बाद ही मनुष्य अपने अंतर के पट खोल पाने में सक्षम होता है।
 
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Last updated on 12-12-2017
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