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Dayitva Bodh Aur Samarpan
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आध्यात्मिक क्षेत्र में अग्रसर होने के लिए मनुष्य के अंदर विश्वास का होना जरूरी है। परंतु यदि वह केवल भाग्य के भरोसे चुपचाप बैठा रहे तो वह जहां खड़ा है, वहीं पड़ा रहेगा। आगे बढऩे के लिए जरूरी है कि वह समय के जीवंत सद्गुरु से मिली युक्ति का उपयोग करें। उसको विश्वास होना चाहिए कि जिस महापुरुष ने उसे यह मार्ग दिखाया है, उसने उसे सही रास्ता बताया है। इतना ही नहीं, उसे यह भी भरोसा होना चाहिए कि वे महापुरुष उसको खुद अपने आप से परिचित होने की युक्ति बता देते हैं। क्योंकि जब मनुष्य अपनी पहचान भूल जाता है तब उसका जीवन बड़ा ही दयनीय हो जाता है। मूल रूप से हम-आप शरीर नहीं आत्मा हैं। शरीर तो क्षणभंगुर है परंतु आत्मा अजर, अमर व अविनाशी है। जब तक हम अपने बुनियादी स्वरूप को नहीं पहचानते तभी तक हम अपने आपको दीन-दुखी व पीडि़त समझते हैं। समय का जीवंत महापुरुष हमें यह बोध करा देता है कि हम अविनाशी के अंश हैं।
 
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Last updated on 22-04-2018
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